Ranchi: डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के दावों के बीच झारखंड का एक संवैधानिक संस्थान ऐसा भी है, जिसने आधुनिकता और जनता की जवाबदेही को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है। हम बात कर रहे हैं झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की, जो आज जनता के विश्वास पर खरा उतरने के बजाय प्रशासनिक उदासीनता, फिजूलखर्ची और संस्थागत निकम्मेपन का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
जिस संस्थान को राज्य के मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदायों के अधिकारों, सुरक्षा और संवैधानिक हितों की ढाल बनना था, वह खुद अंधकार की गर्त में डूबा हुआ है। विडंबना की पराकाष्ठा यह है कि बीते दो वर्षों से आयोग की आधिकारिक वेबसाइट तक अपडेट नहीं हुई है। जिस डिजिटल पोर्टल को अल्पसंख्यकों की शिकायतों के निवारण, सरकारी योजनाओं की जानकारी और पारदर्शी संवाद का माध्यम होना चाहिए था, वह आज एक खंडहर वेब-पेज बनकर रह गया है।
तीन वर्षों की ‘शाही मेहमाननवाजी’ और शून्य उपलब्धि
झारखंड सरकार के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की 8 सितंबर 2023 की अधिसूचना के तहत गठित आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की लंबी-चौड़ी फौज तैनात की गई थी। हाल ही में तीन वर्षों का कार्यकाल पूरा होने के बाद ये तमाम पदधारक अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इन्होंने आम अल्पसंख्यकों के लिए किया क्या?
लाखों रुपये के मासिक भत्ते, सरकारी गाड़ियां, आलीशान दफ्तर और प्रशासनिक तामझाम का पूरा लुत्फ उठाने वाले इन कर्ता-धर्ताओं ने आयोग की सार्वजनिक छवि और सूचना तंत्र को सुधारने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की टोली तीन साल तक कुर्सियों पर बैठी रही, पर किसी ने यह जहमत नहीं उठाई कि आयोग की वेबसाइट पर राज्य के लाखों अल्पसंख्यकों के लिए बुनियादी जानकारी ही अपलोड करा दी जाए। वर्तमान में भी उपाध्यक्ष प्रनेश सोलोमन और सचिव मुमताज अली अहमद जैसे उच्चाधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि यह प्रशासनिक तंत्र केवल फाइलें पलटने और सरकारी मियाद पूरी करने में व्यस्त है, जबकि आयोग के वास्तविक उद्देश्य पूरी तरह हाशिए पर चले गए हैं।
चक्रव्यूह में फंसे पीड़ित, टूटी उम्मीदें
आज स्थिति यह है कि राज्य के दूर-दराज के गांवों संथाल परगना के जंगलों से लेकर कोल्हान और पलामू प्रमंडल तक के सैकड़ों निर्धन व लाचार आवेदक आयोग की चौखट पर न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जो पीड़ित शारीरिक रूप से रांची स्थित आयोग के दफ्तर नहीं पहुंच सकते, वे ऑनलाइन पोर्टल का रुख करते हैं। लेकिन वहां उन्हें क्या मिलता है? सिर्फ सन्नाटा और तकनीकी रूप से मृत पड़ी वेबसाइट।
लाखों जागरूक युवा, छात्र और शोधार्थी जब सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं (छात्रवृत्ति, स्वरोजगार ऋण, कानूनी सहायता आदि) की जानकारी खोजने आयोग के वेब पते पर जाते हैं, तो उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। शिकायतों को दर्ज कराने और उनकी स्थिति जांचने की कोई विश्वसनीय ऑनलाइन व्यवस्था नहीं है। आम नागरिक अपनी शिकायतों का पुलिंदा लेकर भटक रहे हैं और उनकी गुहार फाइलों के अंबार में दम तोड़ रही है।
जनता के पैसों का धुआं, हर महीने लाखों खर्च, आउटपुट ‘जीरो’
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस निष्क्रिय आयोग को चलाने के नाम पर हर महीने राज्य के करदाताओं की गाढ़ी कमाई से लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। दफ्तर का किराया, बिजली, सफाई, कर्मचारियों का वेतन और अधिकारियों के ठाठ-बाट पर बजट बेरोकटोक खर्च हो रहा है, लेकिन जवाबदेही शून्य है। यदि कोई आम नागरिक या आरटीआई कार्यकर्ता आयोग के कामकाज का लेखा-जोखा मांगना चाहे, तो उसके पास डिजिटल माध्यम से कोई डेटा प्राप्त करने का रास्ता तक नहीं है। यह सीधे तौर पर जनता के पैसे का दुरुपयोग और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उपहास है।
दूसरे राज्यों से सीखने की जरूरत
झारखंड की इस दयनीय स्थिति के उलट जब हम देश के अन्य राज्यों के अल्पसंख्यक आयोगों की कार्यप्रणाली पर नजर डालते हैं, तो फर्क साफ नजर आता है:
- दिल्ली और महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग: इन आयोगों ने अत्याधुनिक ई-पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किए हैं। यहां कोई भी पीड़ित घर बैठे अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकता है, रियल-टाइम ट्रैकिंग कर सकता है और हर महीने आयोग द्वारा की गई कानूनी व प्रशासनिक कार्यवाहियों का बुलेटिन सार्वजनिक रूप से वेबसाइट पर जारी किया जाता है।
- कर्नाटक और पश्चिम बंगाल: इन राज्यों के आयोगों ने अपनी वेबसाइटों को अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं, प्री-मैट्रिक/पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियों, कौशल विकास और कोचिंग कार्यक्रमों से सीधे एकीकृत किया हुआ है। कोई भी योजना शुरू होते ही उसका संपूर्ण विवरण, पात्रता और आवेदन लिंक तुरंत पोर्टल पर साझा किया जाता है।
- केरल राज्य अल्पसंख्यक आयोग: केरल में आयोग की वेबसाइट पर कानूनी परामर्श के लिए ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग से लेकर त्वरित सुनवाई का डेटाबेस उपलब्ध रहता है।
अन्य राज्यों में जहां आयोग एक जीवंत, पारदर्शी और सक्रिय संवैधानिक संस्था के रूप में कार्य कर रहे हैं, वहीं झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग आज तक बुनियादी वेबसाइट अपडेट करने जितनी तत्परता भी नहीं दिखा पाया है।
कब जागेगा सोया हुआ हुक्मरान?
आयोग की इस आपराधिक निष्क्रियता से यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अल्पसंख्यक समाज का इस्तेमाल केवल चुनावी घोषणापत्रों तक सीमित है? जिस संस्था का गठन अल्पसंख्यकों के बुनियादी अधिकारों के संरक्षण के लिए हुआ था, जब वही संस्थान अपनी मौजूदगी का न्यूनतम डिजिटल प्रमाण भी न दे पाए, तो व्यवस्था की नीयत पर उंगली उठना तय है।
यदि झारखंड सरकार और संबंधित विभाग ने तुरंत संज्ञान लेकर आयोग की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय समीक्षा नहीं की, वेबसाइट का आधुनिकीकरण नहीं कराया और जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की, तो यह आयोग केवल एक सफेद हाथी बनकर रह जाएगा। इंसाफ की राह तकते सैकड़ों पीड़ितों का धैर्य अब जवाब दे रहा है।

तीन वर्षों की ‘शाही मेहमाननवाजी’ और शून्य उपलब्धि
दूसरे राज्यों से सीखने की जरूरत


