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रांची नगर निगम को हाईकोर्ट की फटकार, बिना कारण लीज रद्द करने का आदेश निरस्त

झारखंड हाईकोर्ट ने अपर बाजार के जालान रोड स्थित जमीन और दुकानों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने रांची नगर निगम की ओर से दुकानों का लाइसेंस (लीज) रद्द करने और उन्हें खाली कराने के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय

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रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने अपर बाजार के जालान रोड स्थित जमीन और दुकानों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने रांची नगर निगम की ओर से दुकानों का लाइसेंस (लीज) रद्द करने और उन्हें खाली कराने के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि नगर निगम के आदेश में कोई ठोस कारण नहीं बताया गया था। ऐसे आदेश कानून के अनुसार सही नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने किरण देवी मोदी समेत आठ याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए मामला दोबारा नगर निगम को भेज दिया है।

1966-67 में आवंटित हुई थी जमीन

मामले के अनुसार, वर्ष 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने वार्ड संख्या 5 के सर्वे प्लॉट नंबर 732 पर 5100 वर्गफुट जमीन मोहन लाल कतची को आवंटित की थी। इस जमीन पर वे टेंट हाउस का कारोबार करते थे।

उनके निधन के बाद उनके बेटे महेंद्र कुमार कतची ने वर्ष 2000 में सुरेश कुमार मोदी और रमेश कुमार मोदी के साथ साझेदारी की। बाद में साझेदारी खत्म होने पर जमीन मोदी बंधुओं के नाम कर दी गई।

इसके बाद नगर निगम ने 9 दिसंबर 2003 को जमीन उनके नाम आवंटित की और 5 जून 2004 को समझौता हुआ। निगम ने 6 अगस्त 2004 को पक्का निर्माण करने की अनुमति भी दी। इसके बाद वहां दुकानें बनाई गईं।

2014 में नगर निगम ने रद्द कर दिया था लाइसेंस

बाद में मोदी परिवार ने दुकानों को शेष सात याचिकाकर्ताओं के नाम पर आवंटित करने का अनुरोध किया। इस पर नगर निगम ने 9 सितंबर 2014 को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

इसके बाद 14 अक्टूबर 2014 को दुकानों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया और 4 दिसंबर 2014 को दुकानें खाली करने का आदेश जारी हुआ। याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद आया फैसला

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने कोर्ट में कहा कि नगर निगम ने बिना कोई ठोस कारण बताए लाइसेंस रद्द कर दिया। उनके पक्ष की दलीलों और दस्तावेजों पर भी विचार नहीं किया गया।

वहीं, नगर निगम की ओर से कहा गया कि लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन हुआ है और यह मामला सब-लेटिंग का है। निगम ने यह भी दलील दी कि विकास कार्य के लिए उसे जमीन की जरूरत है।

12 सप्ताह में दोबारा फैसला करेगा नगर निगम

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि 14 अक्टूबर 2014 का आदेश केवल तीन पंक्तियों का था और उसमें कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया था। 13 फरवरी 2015 के आदेश में भी पुरानी बातों को ही दोहराया गया था।

इसके बाद कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के तीनों आदेश रद्द कर दिए।

हाईकोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का पूरा मौका दिया जाए और उनके तर्कों व दस्तावेजों पर विचार करने के बाद नया और तर्कसंगत आदेश पारित किया जाए। यह प्रक्रिया कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के 12 सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी।

तब तक दुकानदारों का कब्जा नहीं हटाया जाएगा। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को नगर निगम के सामने उपस्थित होकर जांच प्रक्रिया में सहयोग करना होगा।

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