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कुदरत के आगे बेबस हुई दुनिया; जाते-जाते 2025 ने दिया 10.8 लाख करोड़ का जख्म

नई दिल्ली: गुजरता हुआ साल 2025 मानवता के इतिहास में जलवायु परिवर्तन के सबसे डरावने साल के रूप में दर्ज हो गया है। हाल ही में जारी ‘काउंटिंग द कॉस्ट 2025’ रिपोर्ट ने दुनिया को चौंका दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल भीषण लू

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नई दिल्ली: गुजरता हुआ साल 2025 मानवता के इतिहास में जलवायु परिवर्तन के सबसे डरावने साल के रूप में दर्ज हो गया है। हाल ही में जारी ‘काउंटिंग द कॉस्ट 2025’ रिपोर्ट ने दुनिया को चौंका दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल भीषण लू (Heatwave), जंगलों की आग, सूखा और तूफानों जैसी आपदाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10.8 लाख करोड़ रुपये (लगभग 122 बिलियन डॉलर) से अधिक का घाव दिया है। ये आंकड़े केवल ‘बीमाकृत नुकसान’ (Insured Loss) पर आधारित हैं, जिसका अर्थ है कि वास्तविक तबाही इससे कहीं ज्यादा भयानक हो सकती है।

कैलिफोर्निया की आग: इतिहास की सबसे महंगी त्रासदी

साल 2025 की सबसे बड़ी और महंगी आपदा अमेरिका के कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग (Wildfires) रही। इस अकेले घटना ने 5.40 लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुँचाया और 400 से अधिक लोगों की जान ले ली। इस आग की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने न केवल बस्तियों को राख किया, बल्कि इसके धुएं और गर्मी का असर स्कॉटलैंड तक देखा गया, जहां रिकॉर्ड तोड़ लू चली।

एशिया पर टूटा कहर: भारत-पाकिस्तान की बाढ़ में गई सबसे ज्यादा जानें

आर्थिक नुकसान के मामले में भले ही अमीर देश आगे दिखें, लेकिन मानवीय क्षति के मामले में एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित रहा।

  • भारत और पाकिस्तान: जून से सितंबर के बीच हुई भीषण मानसूनी बारिश और बाढ़ ने 1,860 लोगों की जान ली और करीब 50,360 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान पहुँचाया।

  • दक्षिण-पूर्व एशिया: नवंबर में आए चक्रवात और बाढ़ ने थाईलैंड और वियतनाम समेत कई देशों में 1,750 जानें लीं और 2.25 लाख करोड़ का नुकसान किया।

  • चीन और फिलीपींस: चीन में आई बाढ़ (1.05 लाख करोड़ का नुकसान) और फिलीपींस में आए टायफून (45 हजार करोड़ का नुकसान) ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया।

दुनिया का कोई कोना नहीं बचा सुरक्षित; ड्रैगन का साया हर महाद्वीप पर

रिपोर्ट बताती है कि 2025 में दुनिया का कोई भी महाद्वीप ऐसा नहीं रहा जहां प्राकृतिक आपदा ने दस्तक न दी हो। ब्राजील का ऐतिहासिक सूखा, स्पेन और पुर्तगाल के जंगलों में लगी भीषण आग और ऑस्ट्रेलिया में फरवरी में आया साइक्लोन इस बात का प्रमाण हैं कि ग्लोबल वार्मिंग अब एक वैश्विक आपातकाल बन चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये आपदाएं ‘प्राकृतिक’ नहीं हैं, बल्कि जीवाश्म ईंधन के अनियंत्रित उपयोग और उत्सर्जन को कम करने में राजनीतिक विफलता का परिणाम हैं।

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