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2 अगस्त 1857: जयमंगल पांडेय और नादिर अली खान ने अंग्रेजों को डोरंडा से खदेड़ा

2 अगस्त 1857 को जयमंगल पांडेय और नादिर अली खान के नेतृत्व में डोरंडा बटालियन में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ। इस क्रांति के बाद रांची में आजाद सरकार और मुक्तिवाहिनी सेना के गठन का उल्लेख मिलता है।

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Ranchi: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 2 अगस्त 1857 का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन शहीद जयमंगल पांडेय और नादिर अली खान के नेतृत्व में भारतीय क्रांतिकारियों ने रांची स्थित डोरंडा बटालियन में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था।

शहीद जयमंगल पांडेय के वंशज सच्चिदानंद पांडेय ने 2 अगस्त 1857 की क्रांति को याद करते हुए इस वीरता की गाथा का वर्णन किया। उनके अनुसार, दोपहर करीब एक बजे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अचानक विद्रोह कर दिया था। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और डोरंडा से भाग खड़े हुए।

बताया जाता है कि यह विद्रोह 62 दिनों तक चला और इसका समापन 4 अक्टूबर 1857 को चतरा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भीषण युद्ध के रूप में हुआ। इस संघर्ष के दौरान 150 भारतीय सैनिकों को एक साथ फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है। चतरा का ‘फांसीहारा तालाब’ इस घटना का गवाह बताया जाता है।

बैरकपुर और मेरठ के विद्रोह की खबर डोरंडा तक पहुंची

1857 का विद्रोह अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय जनता के आक्रोश की एक बड़ी अभिव्यक्ति था। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर और 10 मई 1857 को मेरठ में हुए सैनिक विद्रोह की खबर रामगढ़ बटालियन के सैनिकों तक पहुंच चुकी थी।

उस समय डोरंडा छावनी के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल रॉबिन्स थे, जबकि जिले की जिम्मेदारी कर्नल डाल्टन के पास थी। बताया जाता है कि 23 जून 1857 को डोरंडा में विद्रोह के लिए सैनिक तैयार थे, लेकिन सूबेदार जयमंगल पांडेय ने इसे उचित समय नहीं मानते हुए विद्रोह को रोक दिया।

सच्चिदानंद पांडेय के अनुसार, यदि उस समय विद्रोह शुरू हो जाता तो उसे बैरकपुर के मंगल पांडेय के विद्रोह की तरह दबाया जा सकता था। सूबेदार जयमंगल पांडेय की सूझ-बूझ के कारण डोरंडा छावनी में प्रस्तावित विद्रोह उस समय टल गया।

डोरंडा में विद्रोह की गुप्त तिथि 2 अगस्त तय हुई

डोरंडा छावनी में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के लिए गुप्त रूप से 2 अगस्त 1857 की तिथि तय की गई। क्रांति की सूचना मिलते ही यूरोपीय दल डोरंडा छोड़कर भाग गया।

क्रांतिकारियों ने डाल्टन के कार्यालय में आग लगा दी और अपर बाजार की जेल पर धावा बोलकर वहां बंद सभी 300 कैदियों को मुक्त करा लिया। इसके बाद क्रांतिकारियों ने तोप के गोलों से चर्च के गुंबद को नष्ट कर दिया।

सूबेदार जयमंगल पांडेय के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने विद्रोह को आगे बढ़ाया और डोरंडा पर अपना अधिकार स्थापित किया। बताया जाता है कि सैनिक जयमंगल पांडेय के आदेश और निर्देश का पालन करते थे।

रांची में आजाद सरकार और मुक्तिवाहिनी सेना का गठन

रांची का शासन चलाने के लिए सैनिकों ने आपसी सहमति से एक आजाद सरकार का गठन किया। जयमंगल पांडेय की अनुशंसा पर विश्वनाथ शाही को इसका प्रधान बनाया गया।

इसके साथ ही जयमंगल पांडेय के नेतृत्व में मुक्तिवाहिनी सेना का गठन किया गया। इस विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि यदि चतरा का युद्ध सफल हो जाता, तो भारत को 1857 में ही आजादी मिल सकती थी। शहीद जयमंगल पांडेय और नादिर अली खान के संघर्ष और बलिदान की गाथा आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में याद की जाती है।

2 अगस्त 1857 की क्रांति ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीय सैनिकों और क्रांतिकारियों के साहस, संघर्ष और बलिदान को सामने रखा। उनकी वीरता की यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

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