पुण्यतिथि संस्मरण (ईश्वर चंद्र विद्यासागर)
रांची: 19वीं सदी के महान समाज सुधारक और शिक्षाविद ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपना पूरा जीवन रूढ़िवादिता को मिटाने, नारी शिक्षा का अलख जगाने और विधवा पुनर्विवाह जैसे क्रांतिकारी बदलावों के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि, अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे कोलकाता की बनावटी राजनीति, अपनों के विश्वासघात और समाज की संकीर्ण मानसिकता से गहरे आहत और मानसिक रूप से व्यथित हो चुके थे। इसी बेरुखी और मानसिक अशांति से दूर, उन्होंने शांति और सादगी की तलाश में एक नया ठिकाना चुना-वर्तमान झारखंड राज्य का जामताड़ा (तत्कालीन कर्माटांड़) क्षेत्र।
कर्माटांड़ का ‘नंदन कानन’ और आदिवासियों का स्नेह
वर्ष 1873-74 के आसपास ईश्वर चंद्र विद्यासागर कर्माटांड़ आए और उन्होंने वहां लगभग तीन एकड़ जमीन खरीदकर एक छोटा सा आशियाना बनाया, जिसे उन्होंने ‘नंदन कानन’ नाम दिया। वह क्षेत्र मुख्य रूप से संथाल आदिवासियों का निवास स्थान था। वहां के गरीब, सरल और निश्छल आदिवासियों के बीच रहकर विद्यासागर जी को अद्भुत आत्मिक शांति मिली। शहर के आडंबरों से दूर, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम लगभग 18 वर्षों का एक बड़ा हिस्सा इसी माटी और संथाल समुदाय के उत्थान में समर्पित कर दिया।
शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक उत्थान की अनूठी पहल
कर्माटांड़ में रहते हुए विद्यासागर जी केवल एकांतवास नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने वहां मानवता की सेवा का एक नया अध्याय शुरू किया:
आदिवासी बालिकाओं के लिए पहला स्कूल: उन्होंने संथाल बच्चों और विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा के लिए कर्माटांड़ में देश के शुरुआती औपचारिक आदिवासी विद्यालयों की स्थापना की। वे दिन में बच्चों को और रात में बुजुर्गों को साक्षर बनाने का काम करते थे।
निःशुल्क होम्योपैथी इलाज: आदिवासियों की बदहाली और बीमारियों को देखते हुए उन्होंने स्वयं होम्योपैथिक चिकित्सा का अध्ययन किया और एक निःशुल्क क्लिनिक खोला। वे खुद घर-घर जाकर बीमार आदिवासियों का इलाज करते थे और उन्हें दवाइयां देते थे।
‘वर्ण परिचय’ का लेखन: बांग्ला भाषा की ऐतिहासिक शिक्षण पुस्तक ‘वर्ण परिचय’ की रचना का एक बड़ा हिस्सा भी इसी कर्माटांड़ की माटी में पूरा हुआ था।
संथाल आदिवासी उन्हें एक मसीहा और ‘भगवान’ की तरह पूजते थे। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का यह जीवन संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान और समाज सुधार केवल नारों में नहीं, बल्कि शोषितों और वंचितों के चेहरे पर मुस्कान लाने में निहित है। आज उनकी इसी ऐतिहासिक कर्मभूमि के सम्मान में कर्माटांड़ प्रखंड का नाम आधिकारिक रूप से ‘विद्यासागर प्रखंड’ रखा गया है।
बंगाल पुनर्जागरण का महान समाज सुधारक
भारतीय इतिहास में 19वीं शताब्दी का समय ‘बंगाल पुनर्जागरण’ (Bengal Renaissance) के नाम से जाना जाता है। इस बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूतों में एक नाम सबसे प्रमुखता से उभरकर आता है-ईश्वर चंद्र विद्यासागर। वे केवल एक महान विद्वान और शिक्षाविद ही नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही रूढ़िवादिता, बाल विवाह और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ कठोर संघर्ष करने वाले महान समाज सुधारक भी थे। उन्हें अपनी प्रकांड विद्वत्ता के लिए ‘विद्यासागर’ (ज्ञान का सागर) और उनकी असीम मानवीय संवेदनाओं के कारण ‘दयार सागर’ (दया का सागर) कहा गया।
प्रारंभिक जीवन और संघर्षपूर्ण शैक्षणिक सफर
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर (तब हुगली/मेदिनीपुर क्षेत्र) स्थित बीरसिंह गांव में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था।
साधनों की कमी और भारी आर्थिक तंगी के बावजूद ईश्वर चंद्र बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे। कहा जाता है कि रात में पढ़ाई करने के लिए उनके घर में तेल का दीपक जलाने तक के पैसे नहीं होते थे, इसलिए वे कोलकाता की सड़कों पर लगे स्ट्रीट लैंप की रोशनी के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई पूरी करते थे। कोलकाता के प्रसिद्ध संस्कृत कॉलेज से 12 वर्षों तक संस्कृत व्याकरण, साहित्य, वेदांत, स्मृति और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन करने के बाद उनकी अद्भुत प्रतिभा से प्रभावित होकर 1839 में कॉलेज द्वारा उन्हें ‘विद्यासागर’ की मानद उपाधि से नवाजा गया।
विधवा पुनर्विवाह आंदोलन और 1856 का ऐतिहासिक कानून
19वीं सदी के मध्य में भारतीय समाज में कम उम्र में बालिकाओं का विवाह कर देना और बाल-विधवाओं की स्थिति अत्यंत नारकीय व दयनीय बना देना आम बात थी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने समाज के इस अंधकार को दूर करने का संकल्प लिया। उन्होंने न केवल रूढ़िवादी सोच का विरोध किया, बल्कि प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों का गहराई से अध्ययन करके यह साबित किया कि शास्त्र भी विधवा पुनर्विवाह की अनुमति देते हैं।
उग्र विरोध और तत्कालीन कट्टरपंथियों के हस्ताक्षरों वाले अभियानों के बावजूद, विद्यासागर जी के अथक प्रयासों और ब्रिटिश सरकार को सौंपी गई दलीलों के बल पर 26 जुलाई 1856 को ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ (Hindu Widows’ Remarriage Act, 1856) कानूनी रूप से पारित हुआ। कानून बनने के बाद 7 दिसंबर 1856 को कोलकाता में भारत का पहला आधिकारिक विधवा विवाह उन्हीं के संरक्षण में संपन्न कराया गया। समाज में मिसाल कायम करने के लिए उन्होंने आगे चलकर अपने इकलौते पुत्र नारायण चंद्र का विवाह भी एक विधवा कन्या से ही कराया।
महिला शिक्षा और शैक्षणिक प्रणालियों में क्रांतिकारी सुधार
विद्यासागर जी का स्पष्ट मानना था कि जब तक महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक देश या समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
बालिका विद्यालयों की स्थापना: उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों और संसाधनों से बंगाल के ग्रामीण इलाकों में 35 से अधिक बालिका विद्यालयों (Girl Schools) का निर्माण कराया।
बेथ्यून स्कूल और उच्च शिक्षा: कोलकाता में महिलाओं की उच्च शिक्षा के लिए ‘बेथ्यून स्कूल’ की नींव रखने में उन्होंने ड्रिंकवॉटर बेथ्यून के साथ सचिव के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिक्षा का समावेशी स्वरूप: जब वे संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बने, तो उन्होंने कॉलेज के दरवाजे गैर-ब्राह्मण और निम्न जाति के छात्रों के लिए भी खोल दिए, जो उस दौर में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने संस्कृत के साथ अंग्रेजी, गणित और पश्चिमी विज्ञान को भी पाठ्यक्रम में जोड़ा।
‘आधुनिक बांग्ला गद्य के जनक’: उन्होंने बांग्ला वर्णमाला को व्यवस्थित और सरल बनाया तथा बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के लिए ‘वर्ण परिचय’ (Borno Porichoy) नामक ऐतिहासिक पुस्तक की रचना की। इसी योगदान के कारण उन्हें ‘आधुनिक बांग्ला गद्य का पिता’ कहा जाता है।
मानवता, सादगी और जीवन का अंतिम पड़ाव
ईश्वर चंद्र विद्यासागर अत्यंत स्वाभिमानी, दयालु और सादगीपसंद व्यक्तित्व के धनी थे। वे हमेशा सादा सूती धोती और चादर पहनते थे। गरीबों, अनाथों और बेसहारों की मदद के लिए वे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते थे।
जीवन के अंतिम समय में, शहर की बनावटी राजनीति और दकियानूसी सोच से परेशान होकर वे वर्तमान झारखंड राज्य के जामताड़ा (कर्माटांड़) क्षेत्र में चले गए और वहां संथाल आदिवासियों के बीच रहने लगे। वहां उन्होंने आदिवासियों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले और उनकी चिकित्सा व भलाई के लिए निरंतर कार्य किया। 29 जुलाई 1891 को 70 वर्ष की आयु में इस महान समाज सुधारक का निधन हो गया। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मानव जाति के दुखों का निवारण कर सके। हम झारखंडवासी और पब्लिक अड्डा की पूरी टीम की ओर से इस महान समाज सुधारक को अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।




