आज की भागदौड़ भरी और व्यस्त दिनचर्या असल में अत्यधिक निष्क्रिय (सेडेंटरी) हो चुकी है, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों को तेजी से जन्म दे रही है। दफ्तर हो या घर, लोग लगातार 8 से 10 घंटे एक ही जगह कुर्सी पर बैठकर स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह शारीरिक गतिहीनता आधुनिक समाज के लिए एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। यदि आप पूरा दिन बैठकर बिताते हैं, तो कभी-कभार की गई एक्सरसाइज या हफ्ते में एक-दो दिन जिम जाना भी आपको इन बीमारियों के खतरे से पूरी तरह नहीं बचा सकता।
धीमा मेटाबॉलिज्म और बीमारियों का बढ़ता खतरा
शारीरिक गतिविधि न के बराबर होने से शरीर का मेटाबॉलिज्म (चयापचय दर) सुस्त पड़ जाता है और इंसुलिन संवेदनशीलता घटने लगती है। नतीजा यह होता है कि शरीर शुगर और फैट को सही तरीके से पचाने में असमर्थ हो जाता है। यही स्थिति आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, फैटी लिवर, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों के जोखिम को तेजी से बढ़ाती है। इसके साथ ही मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों में दर्द, अकड़न और बढ़ता मोटापा आम समस्याएं बन चुकी हैं।
‘अदृश्य हत्यारा’ साबित हो रही निष्क्रिय व्यस्तता
अक्सर काम के त्वरित नतीजों और तारीफ के चक्कर में लोग अनजाने में सेहत से समझौता कर बैठते हैं। पर्याप्त नींद, समय पर पौष्टिक आहार और 10-15 मिनट की पैदल सैर जैसी छोटी-छोटी आदतें टल जाती हैं, जो लंबे समय में सेहतमंद रहने की बुनियादी जरूरत हैं।
खराब जीवनशैली का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि शरीर इस पर बहुत धीमी प्रतिक्रिया देता है। ब्लड प्रेशर का बढ़ना या ब्लड शुगर का अनियंत्रित होना शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाता। जब तक बीमारियों का पता चलता है, तब तक शरीर को अंदर से काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस निष्क्रिय जीवनशैली को एक ‘अदृश्य हत्यारा’ (साइलेंट किलर) मान रहे हैं। ऐसे में दिनचर्या में वॉक और ब्रेक लेकर सक्रियता बनाए रखना बेहद आवश्यक है, क्योंकि सिर्फ काम में व्यस्त होने का अर्थ स्वस्थ होना बिल्कुल नहीं है।




