फॉण्ट कनवर्टर NEW

इस मंदिर में महिलाओं की एंट्री क्यों है बंद? जानें कार्तिकेय से जुड़ी कथा

हरियाणा के पिहोवा स्थित प्राचीन स्वामी कार्तिकेय मंदिर में पौराणिक श्राप और मान्यताओं के कारण महिलाएं प्रवेश नहीं करती हैं, जहां केवल पुरुषों द्वारा पूजन किया जाता है।

अपनी भाषा में पढ़ें

Spiritual Desk: भारत में भगवान कार्तिकेय के कई प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर स्थित हैं, विशेष रूप से दक्षिण भारत में उनकी व्यापक रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले स्थित पिहोवा के पावन सरस्वती तीर्थ तट पर बना स्वामी कार्तिकेय मंदिर अपनी एक अनोखी और कठोर परंपरा के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और दर्शन पर पाबंदी है, और श्रद्धालु महिलाएं भी पौराणिक मान्यताओं के कारण स्वयं यहां जाने से बचती हैं।

Read more: अष्टविनायक वरदविनायक मंदिर: महड़ में 1892 से लगातार जल रहा अखंड ‘नंददीप’

क्या है मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों—भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश के समक्ष संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करने की शर्त रखी। कार्तिकेय जी अपने वाहन मोर पर सवार होकर पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, जबकि भगवान गणेश ने माता-पिता को ही समस्त संसार मानकर उनकी तीन बार परिक्रमा पूरी कर ली। गणेश जी की इस बुद्धि और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनका राजतिलक कर दिया और उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया।

कार्तिकेय का क्रोध और दिया गया श्राप

जब देवर्षि नारद ने कार्तिकेय जी को इस घटना की जानकारी दी, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। बड़ा पुत्र होने के नाते उन्हें लगा कि उनके साथ अन्याय हुआ है। अत्यधिक क्षोभ में आकर उन्होंने अपनी त्वचा और मांस त्यागकर माता-पिता के चरणों में समर्पित कर दिए और पिंडी रूप धारण कर लिया। पौराणिक मान्यता है कि उसी क्रोध की अवस्था में उन्होंने श्राप दिया था कि जो भी स्त्री उनके इस क्षत-विक्षत पिंडी रूप के दर्शन करेगी, उसे सात जन्मों तक वैधव्य (विधवा होने का कष्ट) भोगना पड़ेगा।

Read more: चावल लेकर क्यों जाते हैं श्रीनाथजी के मंदिर? जानें मान्यता

केवल पुरुषों को है पिंडी पूजन का अधिकार

क्रोध शांत होने और शारीरिक जलन को दूर करने के लिए देवताओं ने भगवान कार्तिकेय के पिंडी रूप का सरसों के तेल और सिंदूर से अभिषेक किया। इसके बाद देवताओं ने उन्हें देव सेना का मुख्य सेनापति (महासेनानी) नियुक्त किया। इसी ऐतिहासिक मान्यता और श्राप के भय के कारण आज भी महिलाएं इस मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करती हैं। मंदिर में केवल पुरुष श्रद्धालु ही भगवान कार्तिकेय के पिंडी रूप पर तेल व सिंदूर अर्पित कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram