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अष्टविनायक वरदविनायक मंदिर: महड़ में 1892 से लगातार जल रहा अखंड ‘नंददीप’

महाराष्ट्र के रायगढ़ स्थित अष्टविनायक के चौथे मंदिर श्री वरदविनायक में वर्ष 1892 से अखंड 'नंददीप' प्रज्ज्वलित है, जहां भक्त स्वयं गर्भगृह में जाकर पूजन कर सकते हैं।

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Spiritual Desk: महाराष्ट्र के पावन अष्टविनायक तीर्थों में चौथे स्थान पर पूजित श्री वरदविनायक मंदिर अपनी अनोखी आध्यात्मिक परंपरा और ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। रायगढ़ जिले के खूबसूरत पर्वतीय क्षेत्र महड़ गांव में स्थित यह मंदिर भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले वरदाता के रूप में विख्यात है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां का अखंड दीप ‘नंददीप’ है, जो वर्ष 1892 से निरंतर प्रज्ज्वलित हो रहा है।

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क्या है वरदविनायक मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में एक निसंतान राजा ने ऋषि विश्वामित्र के निर्देश पर भगवान गणेश के एकाक्षरी मंत्र का जप किया, जिससे उन्हें रुक्मांगद नामक धर्मनिष्ठ पुत्र की प्राप्ति हुई। बड़े होने पर रुक्मांगद जब ऋषि वाचक्नवी के आश्रम पहुंचे, तो ऋषि पत्नी मुकुंदा उन पर मोहित हो गईं। रुक्मांगद के इनकार करने पर देवराज इंद्र ने उनका रूप धारण कर मुकुंदा से संबंध बनाए, जिससे ‘ग्रिसमाद’ नामक पुत्र का जन्म हुआ।

सच्चाई जानने पर ग्रिसमाद और मुकुंदा ने एक-दूसरे को श्राप दिया। पश्चाताप के लिए ग्रिसमाद ने पुष्पक वन में भगवान गणेश की कठोर तपस्या की। गणपति जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ग्रिसमाद ने प्रार्थना की कि भगवान गणेश इसी स्थान पर विराजमान होकर सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करें। इसके बाद इस स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ और भगवान गणेश ‘वरदविनायक’ (वरदान देने वाले विनायक) के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

1725 में निर्मित भव्य स्थापत्य और 25 फीट ऊंचा स्वर्ण शिखर

वर्तमान वरदविनायक मंदिर का निर्माण वर्ष 1725 में पेशवा कालीन सूबेदार रामजी महादेव बिवलकर ने करवाया था। एक सुरम्य तालाब के किनारे स्थित यह पूर्वमुखी मंदिर वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है:

  • शिखर व प्रतिमाएं: मंदिर के शीर्ष पर 25 फीट ऊंचा स्वर्ण शिखर स्थापित है। मंदिर के चारों कोनों पर चार हाथियों की भव्य प्रतिमाएं निर्मित हैं।

  • गर्भगृह और देवता: गर्भगृह में भगवान गणेश के साथ उनकी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि की मूर्तियां विराजमान हैं। यहां एक शिवलिंग, नवग्रह देवताओं की मूर्तियां और मूषक की प्रतिमा भी स्थापित है।

  • सीधा प्रवेश: इस मंदिर की प्रमुख विशेषता यह है कि श्रद्धालु स्वयं गर्भगृह में जाकर भगवान के चरण स्पर्श और पूजन कर सकते हैं।

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माघी चतुर्थी और गणेशोत्सव पर उमड़ता है जनसैलाब

मंदिर में माघी गणेश जयंती और भाद्रपद मास की गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक विशाल धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु 1892 से जल रहे अखंड नंददीप के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि का वरदान प्राप्त करते हैं।

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