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ट्रंप की धमकी और ईरान में गृहयुद्ध: मोदी सरकार ने काबुल में पलटी बाजी!

India News: दक्षिण एशिया के नक्शे पर एक ऐसी बिसात बिछी है, जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक की नींद उड़ा दी है। एक तरफ जहां भारत का भरोसेमंद साथी ईरान पिछले तीन सालों के सबसे भीषण गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है, वहीं

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India News: दक्षिण एशिया के नक्शे पर एक ऐसी बिसात बिछी है, जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक की नींद उड़ा दी है। एक तरफ जहां भारत का भरोसेमंद साथी ईरान पिछले तीन सालों के सबसे भीषण गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है, वहीं भारत ने अफगानिस्तान में अपनी ‘साइलेंट’ कूटनीति से सबको चौंका दिया है। काबुल की सत्ता संभाल रहे तालिबान ने नूर अहमद नूर को दिल्ली भेजा है, तो जवाब में भारत ने करण यादव को काबुल में कमान सौंप दी है।

चाबहार पर खतरा, तो ‘प्लान-बी’ तैयार

भारत के लिए यह कदम मजबूरी भी है और मास्टरस्ट्रोक भी। ईरान इस वक्त गृहयुद्ध के मुहाने पर है; सड़कों पर हिंसा है और डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी दे रखी है। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में करोड़ों का निवेश किया है, लेकिन वहां की अस्थिरता को देखते हुए भारत अब पूरी तरह ईरान के भरोसे नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत ने सीधे अफगानिस्तान में अपनी जड़ें मजबूत करना शुरू कर दिया है ताकि मध्य एशिया तक पहुंच का रास्ता किसी भी हाल में बंद न हो।

तालिबान अब पाकिस्तान नहीं, भारत का मुरीद!

कभी पाकिस्तान की ‘रणनीतिक गहराई’ कहा जाने वाला तालिबान आज भारत की ओर देख रहा है। वजह साफ है—पाकिस्तान ने वहां अशांति फैलाई, जबकि भारत ने संसद भवन, सलमा बांध और स्कूल बनाकर अफगान जनता का दिल जीता। अब तालिबान चाहता है कि भारत अपनी अधूरी विकास परियोजनाओं को फिर से शुरू करे। करण यादव की नियुक्ति इसी ओर इशारा है कि भारत अब अपने ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए चीन और पाकिस्तान द्वारा छोड़े गए खाली स्थान को भरने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।

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हां, यह भारत की ‘कठोर राष्ट्रहित’ वाली नई नीति है। जहां दुनिया तालिबान को मान्यता देने पर उलझी है, वहां भारत ने अपना राजनयिक मिशन शुरू कर यह साफ कर दिया है कि वह अपने हितों और परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ईरान में जलती मस्जिदों की लपटों के बीच काबुल में भारत का यह नया अवतार वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित होने वाला है।

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