New Delhi — केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने छात्रों के डिजिटल पहचान पत्र यानी ‘अपार आईडी’ (APAAR ID) की प्राइवेसी पॉलिसी में बड़ा बदलाव किया है। अब छात्रों का यह डिजिटल रिकॉर्ड केवल स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजगार और भर्ती प्रक्रिया के दौरान शैक्षणिक दस्तावेजों के डिजिटल सत्यापन (वेरिफिकेशन) में भी उपयोग किया जा सकेगा। अपडेटेड नीति के तहत अधिकृत नियोक्ता उम्मीदवार की पूर्व सहमति प्राप्त करने के बाद उसकी डिग्री, डिप्लोमा, मार्कशीट और अन्य सर्टिफिकेट्स की डिजिटल रूप से प्रामाणिकता जांच सकेंगे।
छात्र की ओटीपी मंजूरी के बिना नहीं दिखेगा रिकॉर्ड
‘ऑटोमेटेड पर्मानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री’ (APAAR) में छात्र का पूरा शैक्षणिक इतिहास डिजिटल प्रारूप में सुरक्षित रहता है। नए नियमों के अनुसार, केवल किसी छात्र की आईडी संख्या होने भर से कोई भी कंपनी या नियोक्ता उसका रिकॉर्ड नहीं देख सकता।
सत्यापन के लिए सबसे पहले नियोक्ता को आधिकारिक पोर्टल पर ‘वेरिफायर’ के रूप में पंजीकृत होना अनिवार्य होगा। इसके बाद वह संबंधित दस्तावेज की जांच के लिए डिजिटल रिक्वेस्ट भेजेगा। छात्र के पास इसका रियल-टाइम अलर्ट पहुंचेगा और जब छात्र ओटीपी (OTP) या ई-साइन (e-Sign) के माध्यम से अपनी मंजूरी देगा, तभी कंपनी को वह दस्तावेज दिखाई देगा। छात्र के पास सत्यापन रिक्वेस्ट को अस्वीकार करने का पूरा अधिकार सुरक्षित रहेगा।
फर्जी डिग्री और सीवी के फर्जीवाड़े पर लगेगी लगाम
इस नीतिगत बदलाव का मुख्य उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में फर्जी दस्तावेजों के उपयोग पर अंकुश लगाना है। नौकरी के लिए आवेदन करते समय उम्मीदवार अपने बायोडाटा (CV) में जिस कॉलेज या डिग्री का दावा करेगा, नियोक्ता उसका सीधा डिजिटल मिलान मूल बोर्ड या विश्वविद्यालय के डेटा से कर सकेगा। इससे जाली अंकपत्रों और बैकडेटेड डिग्रियों के सहारे नौकरी पाने के खेल पर पूरी तरह रोक लगने की उम्मीद है।
सेवा शुल्क और डेटा सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवाल
सरकारी स्तर पर अपार आईडी बनाने के लिए कोई शुल्क तय नहीं किया गया है, लेकिन साइबर कैफे, एमपी ऑनलाइन और सीएससी कियोस्क पर इसके निर्माण और लैमिनेशन-प्रिंटिंग के नाम पर 150 से 200 रुपये तक खर्च होने की बात सामने आ रही है। यदि देश के करीब 30 करोड़ युवा इसे बनवाते हैं, तो यह अप्रत्यक्ष खर्च हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
दूसरी तरफ, डेटा की निजता को लेकर भी बहस जारी है। हालांकि सरकारी पॉलिसी में छात्रों का निजी डेटा किसी भी कंपनी को बेचने का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन थर्ड पार्टी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स के इस्तेमाल और डेटा ट्रांसफर की शर्तों को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों का डेटा कितने समय तक और किन परिस्थितियों में सुरक्षित रहेगा, इसकी कड़ी निगरानी जरूरी होगी।



