रांची: भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक इतिहास में जब भी देश के मूल कानून के निर्माण की बात आती है, तो उन 15 दूरदर्शी महिला विभूतियों का नाम गर्व से लिया जाता है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव रखी। इन्हीं अमर नायिकाओं में एक अद्वितीय नाम ‘बेगम क़दसिया ऐज़ाज़ रसूल’ का है। 299 सदस्यीय भारतीय संविधान सभा में वह एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। पर्दा प्रथा और सामंती व्यवस्था की बेड़ियों को तोड़कर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच तक पहुँचने वाली बेगम ऐजाज रसूल ने न केवल संविधान निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, बल्कि स्वतंत्र भारत के राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य को भी नई दिशा दी।
शाही परिवार में जन्म और राजनीतिक चेतना का उदय
बेगम ऐजाज रसूल का जन्म 2 अप्रैल 1908 को अविभाजित पंजाब के मलेरकोटला रियासत के एक संभ्रांत घराने में हुआ था। उनके पिता सर ज़ुल्फ़िकार अली ख़ान एक जाने-माने राजनीतिज्ञ और विद्वान थे। बचपन से ही अपने पिता की राजनीतिक गतिविधियों और बैठकों को करीब से देखने के कारण उनके भीतर सार्वजनिक जीवन के प्रति गहरी समझ विकसित हुई। मात्र 14-15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पर्दा प्रथा को त्याग दिया और सामाजिक सरोकारों से जुड़ गईं।
वर्ष 1929 में उनका विवाह संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के हरदोई जिले स्थित संडीला के जमींदार नवाब सैयद ऐजाज रसूल से हुआ। विवाह के पश्चात वे अवध की राजनीति और समाज सेवा में सक्रिय हो गईं।
चुनावी राजनीति में शुरुआती सफलताएं
ब्रिटिश शासन काल के दौरान जब महिलाओं की राजनीति में भागीदारी न के बराबर थी, तब बेगम ऐजाज रसूल ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1937 में वे संयुक्त प्रांत (यूपी) विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं। खास बात यह थी कि उन्होंने किसी आरक्षित सीट के बजाय गैर-आरक्षित (सामान्य) सीट से चुनाव लड़कर शानदार जीत दर्ज की थी। 1937 से 1940 तक उन्होंने यूपी विधान परिषद की उपसभापति (Deputy President) के रूप में कार्य किया और वर्ष 1950 से 1952 तक वे विधान परिषद में विपक्ष की नेता भी रहीं।
संविधान सभा में ऐतिहासिक पदार्पण और क्रांतिकारी विचार
14 जुलाई 1947 को बेगम ऐजाज रसूल संयुक्त प्रांत से मुस्लिम लीग की प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा की सदस्य बनीं। संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान वे मौलिक अधिकारों की सलाहकार समिति और अल्पसंख्यकों की उप-समिति की महत्वपूर्ण सदस्य थीं।
संविधान सभा की बहसों में बेगम रसूल ने धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय अखंडता, अल्पसंख्यकों के अधिकार, संपत्ति के अधिकार और राष्ट्रभाषा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अत्यंत निर्भीक और स्पष्ट विचार व्यक्त किए।
धर्म पर आधारित पृथक निर्वाचन प्रणाली का कड़ा विरोध:
विभाजन के दर्द से गुजर रहे देश में बेगम ऐजाज रसूल ने अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) की मांग का पुरजोर विरोध किया। उनका मानना था कि पृथक निर्वाचन प्रणाली ने ही देश में सांप्रदायिकता का बीज बोया और अंततः विभाजन का कारण बनी। उन्होंने संविधान सभा में तर्क दिया कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समुदाय से अलग करने के बजाय उनके साथ मिलकर मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा था- “अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली खुद उनके अस्तित्व के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी।”
बहुसंख्यक समुदाय के दायित्व पर जोर:
जहाँ उन्होंने पृथक निर्वाचन का विरोध किया, वहीं उन्होंने बहुसंख्यक समुदाय को भी यह याद दिलाया कि एक मजबूत और अखंड भारत के लिए यह बहुसंख्यकों का दायित्व है कि वे अल्पसंख्यकों के भीतर सुरक्षा और न्याय का विश्वास पैदा करें।
मौलिक अधिकारों और राष्ट्रभाषा पर विचार:
अनुच्छेद 19 जैसे मौलिक अधिकारों पर बहस के दौरान जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर कई तरह के प्रतिबंध जोड़े जा रहे थे, तब उन्होंने खुलकर टिप्पणी की थी कि “जो अधिकार एक हाथ से दिए जा रहे हैं, उन्हें दूसरे हाथ से छीना जा रहा है।” इसके अलावा, राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के कठिन शब्दों के बजाय उन्होंने ऐसी ‘हिंदुस्तानी’ भाषा की वकालत की जिसे आम जनता आसानी से समझ सके।
स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में भूमिका
वर्ष 1950 में जब भारत में मुस्लिम लीग भंग हुई, तो बेगम ऐजाज रसूल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गईं। 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें देश की पहली राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। वे 1952 से 1956 तक राज्यसभा सदस्य रहीं। इसके बाद 1969 से 1989 तक लगातार दो दशकों तक वे उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य रहीं। 1969 से 1971 के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में समाज कल्याण और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री का पदभार भी संभाला।
खेल, समाज सेवा और आत्मकथा
राजनीति के अलावा खेलकूद के विकास में भी उनका अभूतपूर्व योगदान रहा। वे लगभग दो दशकों तक ‘भारतीय महिला हॉकी महासंघ’ (Indian Women’s Hockey Federation) की अध्यक्ष रहीं और उन्होंने एशियाई महिला हॉकी महासंघ का नेतृत्व भी किया। भारत में महिलाओं के बीच हॉकी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय काफी हद तक उन्हें दिया जाता है।
उन्होंने अपनी आत्मकथा “From Purdah to Parliament” शीर्षक से लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने पर्दे के पीछे की बंदिशों से निकलकर संवैधानिक और संसदीय लोकतंत्र के शीर्ष तक पहुँचने की अपनी प्रेरक जीवन यात्रा का जीवंत वर्णन किया है।
सम्मान और विरासत
समाज सेवा, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2000 में उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। 1 अगस्त 2001 को 93 वर्ष की आयु में लखनऊ में इस महान दूरदर्शी नेता का निधन हो गया।
बेगम ऐजाज रसूल का जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि देशप्रेम, राष्ट्रीय अखंडता और प्रगतिशील सोच किसी भी धार्मिक या सामाजिक बंधन से कहीं ऊपर होती है। भारत का संविधान जब-जब अपनी समावेशी भावना के लिए याद किया जाएगा, बेगम ऐजाज रसूल का नाम इसमें स्वर्णिम अक्षरों में चमकता रहेगा।




