रांची: महान मुगल सम्राट अकबर का शासनकाल न केवल विशाल साम्राज्यवादी विस्तार के लिए, बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति के अभूतपूर्व संरक्षण के लिए भी जाना जाता है। इस दौर में मध्य एशिया और ईरान से कई महान विद्वानों और कवियों ने भारत का रुख किया। इन्हीं में से एक नाम ‘जमालुद्दीन मुहम्मद’, जिन्हें साहित्य की दुनिया में उर्फी शीराजी (Urfi Shirazi) के नाम से जाना जाता है, का है। वे 16वीं शताब्दी के सबसे प्रतिभाशाली और प्रखर फारसी कवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अकबर के दरबार में अपनी अद्भुत कसीदाकारी (प्रशंसा काव्य) और ग़ज़लों से अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।
प्रारंभिक जीवन और ईरान से भारत आगमन
उर्फी शीराजी का जन्म लगभग 1555-1556 ईस्वी में ईरान के प्रसिद्ध सांस्कृतिक शहर शीराज में हुआ था। उनके पिता जैनुद्दीन बलवी शीराज के प्रांतीय प्रशासन में एक उच्च पद पर कार्यरत थे, जो अक्सर ‘उर्फ’ (सामान्य कानून) से जुड़े मामलों का निपटारा करते थे। इसी शब्द से प्रभावित होकर जमालुद्दीन ने अपना काव्य-उपनाम (तखल्लुस) ‘उर्फी’ चुना।
बचपन से ही मेधावी उर्फी ने पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ संगीत, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा और सुलेखन (Calligraphy) में विशेषज्ञता हासिल की। हालाँकि, किशोरावस्था में चेचक (Smallpox) की बीमारी के कारण उनका चेहरा प्रभावित हुआ, लेकिन उनके आत्मविश्वास और ज्ञान में कोई कमी नहीं आई। 16वीं शताब्दी में भारत के मुगल दरबार की समृद्धि और कला-संरक्षण की ख्याति सुनकर 1585 ईस्वी में वे समुद्र मार्ग से भारत पहुंचे।
मुगल दरबार में प्रवेश और राजकीय संरक्षण
भारत आगमन के बाद उर्फी सर्वप्रथम दक्कन के अहमदनगर पहुंचे और फिर फतेहपुर सीकरी आए। यहाँ उनकी मुलाकात अकबर के दरबार के महान कवि-रत्न और विद्वान शेख अबुल फैज ‘फैजी’ से हुई। फैजी उनकी असाधारण काव्य-प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने उर्फी को शाही शिविर में स्थान दिलवाया।
इसके पश्चात उर्फी को अकबर के प्रमुख अमीर हकीम अबुल फतह गिलानी तथा प्रसिद्ध सैन्य कमांडर व विद्वान मिर्जा अब्दुल रहीम ‘खान-ए-खाना’ का संरक्षण प्राप्त हुआ। खान-ए-खाना ने उर्फी की प्रतिभा को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें बादशाह अकबर तथा राजकुमार सलीम के समक्ष प्रस्तुत किया। अकबर के दरबार में शामिल होने के बाद उर्फी ने कई महत्वपूर्ण राजकीय अभियानों में भाग लिया, जिनमें 1588 का कश्मीर दौरा भी शामिल था।
‘सबक-ए-हिंदी’ शैली और साहित्यिक विशेषताएं
उर्फी शीराजी को फारसी काव्य शैली में ‘सबक-ए-हिंदी’ (भारतीय फारसी शैली) के प्रमुख संस्थापकों और संवर्द्धकों में से एक माना जाता है। उनकी रचनाओं की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं:
कसीदाकारी में महारत: उर्फी को कसीदा (प्रशंसात्मक काव्य) लेखन में अद्वितीय महारत हासिल थी। उन्होंने अनवारी और खाकानी जैसे पूर्ववर्ती फारसी दिग्गजों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसमें दर्शन, आत्म-सम्मान और गहन विचारों का समावेश किया।
स्वतंत्र और आत्म-अभिमानी विचार: उर्फी अपनी हाजिरजवाबी, तीखे व्यंग्य और अप्रतिम स्वाभिमान के लिए जाने जाते थे। उनकी शायरी में गरीबी, आत्म-सम्मान और इंसानी स्वाभिमान का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मिलता है। वे ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और सांसारिक मोह-माया के प्रति विरक्ति का संदेश देते थे।
ग़ज़ल और मसनवी में योगदान: यद्यपि उनके कसीदे अधिक प्रसिद्ध हुए, लेकिन उनकी ग़ज़लों में गहरे दार्शनिक विचार और अनूठे रूपक (Metaphors) देखने को मिलते हैं। उन्होंने ‘मजमा-अल-अबकार’ जैसी प्रसिद्ध मसनवी तथा सूफी दर्शन पर ‘नफीसा’ नामक गद्य ग्रंथ की रचना भी की।
तकालीन ऐतिहासिक ग्रंथों (जैसे अब्दुल कादिर बदांयूनी के ‘मुंतखाब-उत-तवारीख’) के अनुसार, उर्फी के जीवनकाल में ही उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि लाहौर और दिल्ली के बाजारों में पुस्तक विक्रेता उनके ‘दीवान’ (काव्य संग्रह) की प्रतियां प्रमुखता से बेचते थे।
अल्पायु में अवसान और अमर विरासत
दुर्भाग्यवश, इस महान कवि की जीवनलीला बहुत कम उम्र में ही समाप्त हो गई। अगस्त 1591 ईस्वी में मात्र 35-36 वर्ष की आयु में लाहौर में पेचिश (Dysentery) की बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके अनमोल साहित्यिक कार्यों को अब्दुल रहीम खान-ए-खाना के पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया और बाद में उनका प्रामाणिक संग्रह प्रकाशित किया गया। कुछ दशकों बाद उनके अवशेषों को शिया आस्था के पवित्र स्थल नजफ (इराक) में स्थानांतरित कर पुनर्दफनाया गया।
उर्फी शीराजी का जीवन और उनका साहित्य इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कला और विद्वत्ता सीमाओं से परे होती है। ईरान की मिट्टी में जन्मे और भारत के मुगल दरबार में पल्लवित हुए उर्फी शीराजी आज भी फारसी और मध्यकालीन भारतीय इतिहास के पन्नों में अमर हैं।




