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15 अगस्त को खुला कांग्रेस कार्यालय, 17 को BSL ने जड़ दिया ताला

Bokaro : जिस कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बोकारो स्टील प्लांट की नींव रखी, जिस कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने BSL की आधारशिला रखी और बाद में इसकी पहली ब्लास्ट फर्नेस को राष्ट्र को समर्पित किया, आज उसी कांग्रेस पार्टी की जिला कमिटी को

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Bokaro :  जिस कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बोकारो स्टील प्लांट की नींव रखी, जिस कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने BSL की आधारशिला रखी और बाद में इसकी पहली ब्लास्ट फर्नेस को राष्ट्र को समर्पित किया, आज उसी कांग्रेस पार्टी की जिला कमिटी को बोकारो स्टील सिटी में अपने जिला कार्यालय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इसलिए, राजनीति में वक्त कब करवट ले ले, कोई नहीं जानता। बोकारो स्टील प्लांट इसका एक दिलचस्प उदाहरण बनकर सामने है।

राजनीतिक विडंबना देखिए-BSL क्षेत्र वाले बोकारो विधानसभा क्षेत्र की विधायक भी कांग्रेस पार्टी से हैं। राज्य में कांग्रेस सत्ता की साझेदार है। सरकार में उसके मंत्री हैं। जिला संगठन भी मौजूद है। लेकिन फिर भी जिला कांग्रेस के पास अपना स्थायी कार्यालय नहीं है।

कभी BSL में कांग्रेस की तूती बोलती थी!

बोकारो की पुरानी राजनीति से परिचित लोग बताते हैं कि एक दौर में BSL की श्रमिक राजनीति में कांग्रेस और उससे जुड़े यूनियनों का खासा प्रभाव हुआ करता था। कहा जाता है कि कांग्रेस नेताओं की सिफारिश का असर BSL के क्वार्टरों से लेकर रोजगार और श्रमिक हितों से जुड़े मामलों तक दिखाई देता था। एक इशारे पर क्वार्टर और एक सिफारिश पर नौकरी वाली कहानियां बोकारो की राजनीतिक स्मृति का हिस्सा रही हैं।

कभी स्थिति ऐसी बताई जाती थी कि BSL प्रबंधन के सामने कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक हैसियत मजबूत थी। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है। कभी कांग्रेस के प्रभाव की चर्चा BSL के क्वार्टरों और नौकरियों तक पहुंचती थी, आज कांग्रेस का जिला संगठन एक कार्यालय के लिए BSL के दरवाजे पर खड़ा दिखाई दे रहा है।

15 अगस्त को कार्यालय, 17 अगस्त को ताला

सेक्टर-3B के आवास संख्या 247 को लेकर मौजूदा विवाद ने कांग्रेस की स्थिति को और चर्चा में ला दिया है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर महथा और उनकी टीम ने 15 अगस्त को आवास का ताला खोलकर उसे जिला कांग्रेस कार्यालय के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण हुआ, मिठाई बांटी गई और कार्यालय शुरू होने का ऐलान किया गया।

लेकिन महज दो दिन बाद, 17 अगस्त को BSL की सुरक्षा टीम पहुंची और आवास पर फिर ताला लगा दिया।
यानी— 15 अगस्त—कांग्रेस का कार्यालय खुला। 17 अगस्त—BSL का ताला लगा।
कांग्रेस के लिए इससे बड़ी विडंबना शायद ही हो।

कांग्रेस कह रही है—हमारा कब्जा अवैध नहीं

जिला कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर महथा का कहना है कि यह अवैध कब्जा नहीं है। उनके अनुसार आवास इंटक के नाम पर BSL से आवंटित था और इंटक के दो गुटों के विवाद में अदालत का फैसला कांग्रेस नेता स्वर्गीय ददई दुबे के पक्ष में आया था। कांग्रेस का दावा है कि इसी आधार पर आवास को जिला कार्यालय बनाया गया और अदालत के फैसले सहित आवश्यक दस्तावेज BSL प्रबंधन को उपलब्ध करा दिए गए हैं।

अब सवाल है—जब कांग्रेस के पास अदालत के फैसले का दावा है, तो BSL ने ताला क्यों लगाया?

और दूसरी तरफ, यदि BSL के पास कब्जे को अवैध मानने का कानूनी आधार है, तो प्रबंधन उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं करता?

इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के दस्तावेज और BSL की आधिकारिक स्थिति सामने आना जरूरी है। असली सवाल कांग्रेस से है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल BSL से ज्यादा कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए।

जिस पार्टी की सरकार ने BSL बनाया, जिस पार्टी की प्रधानमंत्री ने इसकी आधारशिला और उद्घाटन किया, उसी पार्टी की जिला कमिटी आज BSL के एक आवास में अपना कार्यालय बनाने को मजबूर क्यों हुई?

जब बोकारो विधानसभा क्षेत्र की विधायक कांग्रेस से हैं, राज्य में कांग्रेस सत्ता की साझेदार है, सरकार में मंत्री हैं—तो फिर जिला कांग्रेस के लिए एक वैध कार्यालय की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी?

क्या कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव इतना कमजोर हो गया है कि अपने जिला कार्यालय के लिए भी उसे BSL के एक आवास को लेकर संघर्ष करना पड़ रहा है?

वक्त का फेर या राजनीतिक प्रभाव का पतन?

कभी BSL में कांग्रेसियों की ‘तूती बोलने’ की चर्चा होती थी।

कभी क्वार्टरों और रोजगार के मामलों में कांग्रेस नेताओं के प्रभाव की कहानियां सुनाई जाती थीं।

आज उसी BSL के सामने कांग्रेस का जिला संगठन अपने कार्यालय के लिए जूझ रहा है।

कभी कांग्रेस BSL से अपनी बात मनवाने की ताकत रखती थी, आज BSL कांग्रेस के कार्यालय पर ताला लगाकर अपनी ताकत दिखा रहा है।

तो सवाल यही है— यह वक्त का फेर है?
सियासत का बदलता मिजाज है?
या फिर बोकारो में कांग्रेस के घटते राजनीतिक प्रभाव की सबसे बड़ी तस्वीर?

और सबसे बड़ा सवाल—

अगर सत्ता में हिस्सेदारी, विधायक और मंत्री होने के बावजूद कांग्रेस अपने जिला कार्यालय के लिए जगह नहीं जुटा पा रही है, तो फिर बोकारो में कांग्रेस की असली राजनीतिक ताकत आखिर कितनी बची है?

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