Spirituality Desk: सावन का महीना आते ही हरियाली के साथ शिव मंदिरों में आस्था का रंग भी गहरा होने लगता है। इस पवित्र माह में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के साथ विवाहित महिलाओं के सोलह श्रृंगार की परंपरा का भी विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना के साथ श्रृंगार करती हैं।
Read more: आपका व्यवहार बदल सकता है सोई हुई किस्मत, जानें ग्रहों का सीधा कनेक्शन!
भारतीय परंपरा में सोलह श्रृंगार को सौभाग्य, सुंदरता और सम्मान से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के बाद सोलह श्रृंगार धारण किए थे। इसी मान्यता के कारण सावन, तीज, हरियाली तीज, करवाचौथ और दूसरे शुभ अवसरों पर यह परंपरा निभाई जाती है।
बिंदी, सिंदूर और मांग टीका का महत्व
सोलह श्रृंगार में बिंदी को विवाहित महिला की पहचान, एकाग्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। सिंदूर को सुहाग का प्रमुख चिन्ह मानते हुए इसे पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन की खुशहाली से जोड़ा जाता है। माथे के मध्य भाग में पहना जाने वाला मांग टीका मानसिक संतुलन और सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है। वहीं आंखों में लगाया जाने वाला काजल सुंदरता के साथ बुरी नजर से बचाने की पारंपरिक मान्यता से जुड़ा है। नथ को विवाहिता के सम्मान और गरिमा का प्रतीक माना जाता है। कानों के झुमके और गले का हार श्रृंगार को पूरा करने के साथ समृद्धि से भी जोड़े जाते हैं।
Read more: भोलेनाथ की असीम कृपा दिलाएगा प्रदोष व्रत, जानें जून 2026 की सही तारीखें!
मंगलसूत्र से हरी चूड़ियों तक जुड़ी हैं मान्यताएं
मंगलसूत्र को पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और अटूट रिश्ते का पवित्र प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाओं के श्रृंगार में इसका विशेष स्थान है। सावन में हरी चूड़ियों का महत्व और बढ़ जाता है। इन्हें खुशहाली, सौभाग्य और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि सावन और हरियाली तीज के दौरान हरी चूड़ियां महिलाओं के श्रृंगार का प्रमुख हिस्सा बनती हैं। बाजूबंद को शक्ति और आत्मविश्वास से जोड़ा जाता है। वहीं हाथों पर रची मेहंदी की गहरी रंगत को प्रेम और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
पायल और बिछिया का भी खास महत्व
अंगूठी को रिश्ते में विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, जबकि कमरबंद को आत्मसंयम और गरिमा से जोड़ा गया है। पैरों में पहनी जाने वाली पायल की मधुर झंकार को घर की शुभता और विनम्रता का संकेत माना जाता है। बिछिया विवाहित महिलाओं के श्रृंगार का हिस्सा है और इसे सुहाग एवं वैवाहिक जीवन की शुभता से जोड़ा जाता है। सोलह श्रृंगार में इत्र या सुगंध का भी स्थान है। पारंपरिक मान्यताओं में इसे सकारात्मक वातावरण और मन की प्रसन्नता से जोड़कर देखा जाता है।
Read more: ससुराल में पाना चाहती हैं मायके जैसा प्यार? अपनाएं ये 4 आसान तरीके!
आधुनिक दौर में भी कायम है सोलह श्रृंगार की परंपरा
फैशन और जीवनशैली में बदलाव के बावजूद सावन और तीज जैसे अवसरों पर पारंपरिक सोलह श्रृंगार का आकर्षण बना हुआ है। कई महिलाएं सभी श्रृंगार न भी करें, फिर भी सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी, बिंदी और मंगलसूत्र जैसे प्रमुख श्रृंगार को अपनाती हैं। सोलह श्रृंगार की परंपरा केवल बाहरी सुंदरता तक सीमित नहीं मानी जाती। यह भारतीय संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके स्वरूप और परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है।




