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रांची: भारतीय इतिहास की किताबों में कई ऐसी तारीखें दर्ज हैं, जिन्होंने न सिर्फ शासकों की तकदीर बदली, बल्कि पूरे देश का भूगोल और भविष्य हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। ‘2 जुलाई’ का दिन भी एक ऐसी ही बेहद दर्दनाक, निर्णायक और ऐतिहासिक घटना का गवाह है। इस दिन, यानी 2 जुलाई 1757 को बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब सिराजुद्दौला की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इतिहासकार इस तारीख को भारत के इतिहास का एक ऐसा मोड़ मानते हैं, जहाँ से मुगलों और नवाबों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगा और भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व की नींव बेहद मजबूत हो गई। यह वह दिन था जिसने भारत को अगले दो सौ सालों की गुलामी के अंधकार में धकेलने का रास्ता साफ कर दिया।
प्लासी का युद्ध और गद्दारी की वह दास्तान
इस पूरी घटनाक्रम को समझने के लिए हमें कुछ दिन पीछे, यानी 23 जून 1757 को मैदान-ए-प्लासी में जाना होगा। प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे कम समय तक चलने वाले लेकिन सबसे विनाशकारी युद्धों में से एक था। नवाब सिराजुद्दौला के पास एक विशाल और शक्तिशाली सेना थी, जिसके सामने अंग्रेजों की सेना बेहद छोटी और कमजोर थी। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत कभी भी बाहरी ताकतों की ताकत से नहीं, बल्कि अपनों के विश्वासघात से हारा है।
नवाब का सबसे भरोसेमंद माना जाने वाला मुख्य सेनापति मीर जाफर पहले ही अंग्रेजों के कमांडर रॉबर्ट क्लाइव के साथ गुप्त समझौता कर चुका था। क्लाइव ने मीर जाफर को लालच दिया था कि यदि वह युद्ध में अंग्रेजों की मदद करेगा, तो सिराजुद्दौला को हटाकर उसे बंगाल का अगला नवाब बना दिया जाएगा। सत्ता के लालच में मीर जाफर ने देश के साथ ऐसा सौदा किया, जिसकी कीमत आने वाली कई पीढ़ियों को चुकानी पड़ी।
जब युद्ध शुरू हुआ, तो मीर जाफर और उसके सहयोगी राय दुर्लभ तथा यार लुत्फ खान की कमान वाली सेना का एक बहुत बड़ा हिस्सा मैदान में चुपचाप खड़ा रहा। नवाब की वफादार सेना के छोटे से हिस्से ने मीर मदान और मोहन लाल के नेतृत्व में अंग्रेजों का वीरता से मुकाबला किया, लेकिन मीर मदान की अचानक मृत्यु के बाद नवाब अकेले पड़ गए। मीर जाफर ने नवाब को गलत सलाह देकर युद्ध का मैदान छोड़कर मुर्शिदाबाद वापस जाने को कहा। नवाब के मैदान छोड़ते ही अंग्रेजों ने जीत हासिल कर ली।
मुर्शिदाबाद का वह आखिरी सफर और नमक हराम देवड़ी
युद्ध के मैदान में जब सिराजुद्दौला को अहसास हुआ कि उनके चारों तरफ सिर्फ गद्दारों का जाल है, तो वे अपनी जान बचाने और दोबारा सेना संगठित करने के उद्देश्य से अपनी बेगम लुत्फुन्निसा और वफादारों के साथ आधी रात को गुप्त रूप से मुर्शिदाबाद से निकल गए। वे पटना की तरफ जाकर फ्रांसीसी सेना से मदद लेने की योजना बना रहे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
रास्ते में छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) के राजमहल के पास एक फकीर ने उन्हें पहचान लिया, जिसे कभी नवाब ने सजा दी थी। उस फकीर ने तुरंत इसकी सूचना मीर जाफर के दामाद मीर कासिम को दे दी। 2 जुलाई 1757 को सिराजुद्दौला को बंदी बना लिया गया और उन्हें वापस मुर्शिदाबाद लाया गया।
मुर्शिदाबाद में मीर जाफर के महल, जिसे आज इतिहास में ‘नमक हराम देवड़ी’ के नाम से जाना जाता है, वहाँ नवाब की किस्मत का फैसला होना था। मीर जाफर खुद इस बात को लेकर असमंजस में था कि सिराजुद्दौला के साथ क्या किया जाए, क्योंकि जनता के बीच नवाब के प्रति सहानुभूति थी। लेकिन मीर जाफर के क्रूर पुत्र ‘मीरान’ के मन में सिर्फ नफरत और सत्ता खोने का डर था। मीरान के इशारे पर ‘मोहम्मद अली बेग’ नाम के एक सिपाही ने बंदी नवाब सिराजुद्दौला पर तलवार से ताबड़तोड़ वार कर दिए। इस तरह मात्र 24 वर्ष की आयु में बंगाल के आखिरी स्वतंत्र नवाब ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। अगले दिन उनके शव को हाथी पर लादकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में घुमाया गया, ताकि जनता में खौफ पैदा किया जा सके।
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की मजबूत होती नींव
सिराजुद्दौला की मृत्यु केवल एक राजा की मौत नहीं थी, बल्कि यह भारत की संप्रभुता की मौत की शुरुआत थी। नवाब की हत्या के बाद वादे के मुताबिक अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल की गद्दी पर बैठा तो दिया, लेकिन वह स्वतंत्र राजा नहीं बल्कि अंग्रेजों के हाथ की एक ‘कठपुतली’ मात्र बनकर रह गया। रॉबर्ट क्लाइव और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जब चाहते, मीर जाफर से मनमाना धन और व्यापारिक रियायतें वसूल करते थे।
बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध, धनी और औद्योगिक रूप से विकसित राज्य था। बंगाल पर नियंत्रण मिलते ही अंग्रेजों के हाथ में असीमित धन-दौलत आ गई। इसी धन के बल पर ब्रिटिश कंपनी ने एक विशाल और आधुनिक सेना तैयार की, जिसका इस्तेमाल उन्होंने बाद में दक्षिण भारत के राजाओं, मराठों और सिखों को हराने के लिए किया।
इतिहासकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि 2 जुलाई को सिराजुद्दौला की हत्या न हुई होती और बंगाल की स्वतंत्रता बची रहती, तो शायद अंग्रेजों को भारत के बाकी हिस्सों पर कब्जा करने का कभी मौका नहीं मिलता। इस घटना ने साबित कर दिया कि व्यापार करने आई एक विदेशी कंपनी अब भारत की ‘किंगमेकर’ बन चुकी थी।
सबक जो इतिहास ने हमें दिया
आज जब हम 2 जुलाई के पन्नों को पलटते हैं, तो सिराजुद्दौला की यह दास्तान हमें केवल एक राजा की हार की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा सबक है कि जब-जब किसी राष्ट्र के भीतर आपसी फूट, सत्ता का लालच और गद्दारी पनपती है, तब-तब विदेशी ताकतें उसका फायदा उठाकर पूरे देश को गुलाम बना लेती हैं। सिराजुद्दौला की हत्या के बाद शुरू हुआ गुलामी का वह सिलसिला 15 अगस्त 1947 को जाकर ही खत्म हो सका, जिसके लिए देश को लाखों कुर्बानियां देनी पड़ीं।

