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कोल लको बोदरा को नमन, हो भाषा के संवैधानिक दर्जे की उठी मांग

Rajnagar : सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत समरसाई में शनिवार को आदिवासी ‘हो’ भाषा की वारंङ क्षिति लिपि के निर्माता एवं महान साहित्यकार ओत् गुरु कोल लको बोदरा की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें नमन किया

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Rajnagar : सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत समरसाई में शनिवार को आदिवासी ‘हो’ भाषा की वारंङ क्षिति लिपि के निर्माता एवं महान साहित्यकार ओत् गुरु कोल लको बोदरा की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें नमन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने ओत् गुरु कोल लको बोदरा के योगदान को याद करते हुए हो भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन पर जोर दिया।

इस अवसर पर कहा गया कि झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत कई राज्यों में आदिवासी हो समाज की हो भाषा बोली जाती है। इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की जरूरत है। हो भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से इसके साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के विकास को गति मिलने की बात कही गई।

वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, परंपरा और संस्कृति से जुड़ी होती है। आदिवासी समाज को अपनी पारंपरिक भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सजग रहना होगा। अपनी भाषा और परंपराओं के संरक्षण के माध्यम से ही समाज अपनी विशिष्ट पहचान और अस्तित्व को मजबूत बनाए रख सकता है।

इस दौरान पूर्व के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा गया कि हो, संताली, मुंडारी समेत सभी आदिवासी एवं स्थानीय भाषाओं में प्राथमिक स्तर से शिक्षा उपलब्ध कराने को लेकर कैबिनेट से स्वीकृति दिलाई गई थी। इसके बाद शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा से बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने के साथ उनकी शैक्षणिक समझ को भी मजबूत किया जा सकता है।

कार्यक्रम में ओत् गुरु कोल लको बोदरा के भाषा और लिपि के क्षेत्र में किए गए योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा हो भाषा के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया गया।

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