नई दिल्ली: रक्षाबंधन का त्योहार हिंदू धर्म के साथ-साथ जैन धर्म में भी विशेष महत्व रखता है। जैन परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन 700 मुनियों की रक्षा की ऐतिहासिक घटना की याद में मनाया जाता है।
जैन ग्रंथों के अनुसार, आचार्य अकंपनाचार्य अपने 700 शिष्यों के साथ हस्तिनापुर पहुंचे थे। इसी दौरान राजा के मंत्री बलि ने मुनियों को परेशान करने के लिए उनके आसपास कांटेदार बाड़ लगवा दी और वहां यज्ञ के नाम पर मांस, हड्डियां और चमड़ा जलवाना शुरू कर दिया। इससे मुनियों को काफी परेशानी हुई और उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया।
मुनि विष्णुकुमार ने बचाया मुनि संघ
मुनियों पर आए संकट की जानकारी मिलने के बाद मुनि विष्णुकुमार हस्तिनापुर पहुंचे। उन्होंने वामन ब्राह्मण का रूप धारण कर मंत्री बलि से तीन कदम भूमि मांगी। अपनी विशेष शक्ति से उन्होंने दो कदमों में विशाल क्षेत्र नाप लिया। तीसरे कदम के लिए जगह नहीं बची तो बलि ने अपनी पीठ आगे कर दी।
इसके बाद बलि को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने मुनियों को परेशान करना बंद कर दिया। इस तरह 700 मुनियों का संकट दूर हुआ।
श्रावण पूर्णिमा से जुड़ी है परंपरा
जैन मान्यता के अनुसार, मुनियों का संकट श्रावण पूर्णिमा के दिन समाप्त हुआ था। इसके बाद लोगों ने इस दिन हाथों में सूत का धागा बांधकर खुशी मनाई। तभी से जैन समाज में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा शुरू हुई।
आज भी जैन परिवारों में इस दिन खीर और मिठाइयां बनाई जाती हैं तथा मुनि विष्णुकुमार की कथा का वाचन किया जाता है।




