फॉण्ट कनवर्टर NEW

पझरी पहाड़ पर लौटी आदिवासी परंपरा की शान, माघ जतरा बना ऐतिहासिक उत्सव

Lohardaga News: लोहरदगा जिले के भंडरा प्रखंड अंतर्गत ग्राम पझरी स्थित ऐतिहासिक पझरी पहाड़ बुधवार को सदियों पुरानी आदिवासी आस्था, लोक-विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का विराट केंद्र बन गया। माघ जतरा महोत्सव 2026 पूरे पारंपरिक वैभव, श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, जिसमें 20

अपनी भाषा में पढ़ें

Lohardaga News: लोहरदगा जिले के भंडरा प्रखंड अंतर्गत ग्राम पझरी स्थित ऐतिहासिक पझरी पहाड़ बुधवार को सदियों पुरानी आदिवासी आस्था, लोक-विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का विराट केंद्र बन गया। माघ जतरा महोत्सव 2026 पूरे पारंपरिक वैभव, श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, जिसमें 20 से 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं व दर्शकों की ऐतिहासिक सहभागिता दर्ज की गई। दूर-दराज के गांवों से पहुंचे लोगों से पूरा क्षेत्र आस्था और उल्लास से सराबोर नजर आया। माघ जतरा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन समय के साथ यह क्षीण होती चली गई थी। वर्ष 2016–17 में कुछ जागरूक ग्रामीणों—बिंदेश्वर उराँव, भुनेश्वर उराँव, एतवा उराँव, बिरेन्द्र उराँव, धन्नो उराँव सहित मात्र 5–6 लोगों—ने इस ऐतिहासिक परंपरा के पुनरुत्थान का संकल्प लिया। उसी छोटे से सामूहिक प्रयास का परिणाम है कि आज यह जतरा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि जिला स्तरीय सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।

इस अवसर पर बिंदेश्वर उराँव ने कहा कि पझरी पहाड़ की माघ जतरा हमारी आदिवासी अस्मिता, प्रकृति-पूजा और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। जब समाज अपनी जड़ों से जुड़ता है, तो इतिहास फिर से जीवंत हो उठता है। 2016–17 में शुरू हुआ छोटा-सा प्रयास आज हजारों लोगों की आस्था का महोत्सव बन चुका है।महोत्सव के दिन अलसुबह से ही नृत्य मंडलियां, गाजा-बाजा, ढोल-नगाड़ा, कलसा के साथ पारंपरिक जुलूस पझरी पहाड़ की ओर बढ़ते नजर आए।रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा, सामूहिक नृत्य और लोकवाद्यों की गूंज ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय वातावरण में बदल दिया। यह दृश्य झारखंड की आदिवासी लोक-संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत कर रहा था। माघ जतरा के दौरान पहान (परंपरागत ग्राम-पुजारी) के नेतृत्व में पहाड़ की चोटी पर विधिवत मुर्गी पूजा संपन्न कराई गई। पूजा के माध्यम से ग्राम-देवता से अच्छी फसल, सुख-शांति, स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना की गई। इस अनुष्ठान में समाज की सामूहिक सहभागिता ने इसकी गरिमा को और अधिक बढ़ाया।

पौराणिक मान्यता के अनुसार पझरी पहाड़ ग्राम-देवता की प्राचीन तपोभूमि रही है।विश्वास है कि माघ मास में यहां सामूहिक पूजा करने से गांव में समृद्धि आती है और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। माघ जतरा चाला अयंग तथा महादेव–पार्वती की पौराणिक कथा से भी जुड़ी हुई है, जिसमें भेष बदलकर महादेव धांगर के रूप में चाला अयंग के यहां कार्य करते हैं और इसी दिन उन्हें मुक्ति मिलती है। लोककथा के अनुसार बूढ़ी मां के गोहाल में गोबर सोने की तरह चमकने लगता है। इसी विश्वास के प्रतीक स्वरूप जतरा से एक दिन पूर्व कुम्बा जलाने की परंपरा निभाई जाती है। माघ जतरा महोत्सव ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब समाज उन्हें अपनी पहचान मानकर सहेजता और आगे बढ़ाता है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी बनकर उभरा है।

इस अवसर पर अभिनव सिद्धार्थ भगत, बिंदेश्वर उराँव, भुनेश्वर उराँव, बिनय उराँव, एतवा उराँव, बीरेंद्र उराँव, महेश उराँव, परमेश्वर महली, इंद्रदेव उराँव, सुमित उराँव, बबलू उराँव, जगजीवन उराँव, महादेव पहान, पुणय उराँव, महादेव मुंडा, प्रमोद उराँव, सुरेंद्र उराँव सहित बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण और श्रद्धालु उपस्थित थे। पझरी पहाड़ माघ जतरा लोहरदगा ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक ऐतिहासिक और गौरवशाली अध्याय के रूप में स्थापित हो गया है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram