Spiritual Adda: पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व ‘पितृपक्ष’ प्रारंभ हो चुका है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले इस 16 दिवसीय काल में पितरों का तर्पण और पिंडदान किया जाता है। सनातन धर्म की परंपरा में पितरों की मृत्यु तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में कौवे को भोजन (काकबलि) अर्पित करने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि जब तक कौवा श्राद्ध का अन्न ग्रहण नहीं करता, तब तक पितरों की आत्मा तृप्त नहीं होती और श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
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भगवान राम और इंद्रपुत्र जयंत की पौराणिक कथा

शास्त्रों के अनुसार, त्रेतायुग में देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण किया था। एक बार जब भगवान श्रीराम और माता सीता वनवास के दौरान विश्राम कर रहे थे, तब जयंत ने शरारतवश कौवे के वेश में आकर माता सीता के चरणों में अपनी चोंच से वार कर दिया। इससे माता सीता के पैर से रक्त बहने लगा। माता सीता को आहत देख भगवान श्रीराम अत्यंत कुपित हुए और उन्होंने एक सूखे तिनके (सींक) को अभिमंत्रित कर ब्रह्मास्त्र के रूप में चला दिया।
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उस अमोघ बाण से बचने के लिए जयंत तीनों लोकों और देवलोक तक भागा, लेकिन भयभीत होकर किसी भी देवता ने उसे शरण नहीं दी। अंत में नारद मुनि की सलाह पर जयंत ने पुनः लौटकर भगवान श्रीराम और माता सीता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की। शरणागत वत्सल श्रीराम ने उसे क्षमा करते हुए उसके एक नेत्र को बाण से शांत किया और वरदान दिया कि पितृपक्ष के दौरान धरती पर कौवों को जो भी भोजन अर्पित किया जाएगा, वह सीधे पितृलोक में उनके पूर्वजों को प्राप्त होगा। तभी से पितृपक्ष में कौवे को ग्रास देने की यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
गरुड़ पुराण में यमराज का संदेशवाहक
गरुड़ पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में कौवे को यमराज का दूत और संदेशवाहक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, पितृलोक के सूक्ष्म जीव और पूर्वज कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों के माध्यम से ही पृथ्वी पर आते हैं और परिजनों द्वारा दिए गए तर्पण को ग्रहण करते हैं। इसलिए श्राद्ध कर्म के दौरान ‘पंचबलि’ यानी गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवताओं के लिए अलग-अलग भाग निकाला जाता है। माना जाता है कि कौवे द्वारा अन्न का एक दाना भी छू लेने से यमराज प्रसन्न होते हैं और पितरों की अतृप्त आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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पितृ दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृपक्ष में कौवों को नियमित रूप से भोजन कराने से जन्मकुंडली में मौजूद गंभीर ‘पितृ दोष’ और ‘कालसर्प दोष’ के नकारात्मक प्रभाव शांत होते हैं। कौवे को भोजन अर्पित करने का भी एक शास्त्रसम्मत नियम है। इसके लिए उड़द की दाल, पके हुए चावल और शुद्ध गुड़ का मिश्रण बनाकर एक पत्तल पर रखा जाता है। इस भोजन को घर की छत या तर्पण स्थल पर कौवों के लिए अर्पित कर पितरों से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार के आरोग्य का आशीर्वाद मांगा जाता है।




