रांची: भारतीय हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में जब भी संजीदा अभिनय, दर्द भरे किरदारों और आँखों से संवाद करने की कला की बात आती है, तो सबसे पहला नाम ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के रूप में मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी का आता है। 1 अगस्त 1933 को जन्मीं महज़बीन बानो (मीना कुमारी का वास्तविक नाम) ने अपने तीन दशक लंबे करियर में 90 से अधिक फिल्मों में काम किया और पर्दे पर ऐसे-ऐसे अमर चरित्र गढ़े जिन्हें आज भी भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर माना जाता है।
बचपन की तंगहाली और ‘बेबी मीना’ के रूप में शुरुआत
मीना कुमारी का जन्म मुंबई के एक गरीब कलाकार परिवार में हुआ था। उनके पिता मास्टर अली बख्श और मां इकबाल बेगम (प्रभावती देवी) दोनों संगीत और रंगमंच से जुड़े थे। परिवार की खस्ता आर्थिक स्थिति के कारण मात्र चार-पांच साल की मासूम उम्र में ही उनके पिता ने उन्हें फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम कराने का फैसला किया।
वर्ष 1939 में आई फिल्म ‘लेदर फेस’ से बाल कलाकार के तौर पर शुरुआत करने वाली महज़बीन को निर्देशकों ने नाम दिया-‘बेबी मीना’। आगे चलकर 1946 में आई फिल्म ‘बच्चों का खेल’ से वे मुख्य अभिनेत्री के रूप में ‘मीना कुमारी’ नाम से पर्दे पर उभरीं।
‘बैजू बावरा’ से मिली नई पहचान और स्टारडम का दौर
वर्ष 1952 में विजय भट्ट द्वारा निर्देशित संगीतमय फिल्म ‘बैजू बावरा’ मीना कुमारी के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म में ‘गौरी’ के किरदार ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। इस प्रदर्शन के लिए उन्हें 1954 में प्रथम ‘फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार’ से नवाजा गया।
इसके बाद बिमल रॉय की ‘परिणीता’ (1953) में उनके स्वाभाविक और शालीन अभिनय ने समीक्षकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिसके लिए उन्हें लगातार दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1950 और 60 के दशक में उन्होंने ‘शारदा’, ‘यहूदी’, ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ और ‘कोहिनूर’ जैसी कई सफल फिल्मों में अपनी अदाकारी का जादू चलाया।
‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ऐतिहासिक रिकॉर्ड
गुरु दत्त के निर्माण में बनी और अबरार अलवी द्वारा निर्देशित 1962 की कालजयी फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में मीना कुमारी का निभाया गया ‘छोटी बहू’ का किरदार हिंदी सिनेमा का एक अविस्मरणीय अध्याय बन गया। सामंती व्यवस्था में घुटती और पति के प्रेम को तरसती ‘छोटी बहू’ के दर्द को उन्होंने जिस गहराई से जिया, वह इतिहास बन गया।
वर्ष 1963 में 10वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में एक ऐसा अभूतपूर्व रिकॉर्ड बना जो आज तक कायम है-फिल्मफेयर की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री श्रेणी में नामांकित तीनों की तीनों फ़िल्में (‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘आरती’ और ‘मैं चुप रहूंगी’) केवल मीना कुमारी की थीं! अंततः ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला।
व्यक्तिगत जीवन का दर्द, शराब और ‘नाज’ नाम से शायरी
पर्दे पर दुख और संवेदनाओं को बखूबी उकेरने वाली मीना कुमारी की असल जिंदगी भी दुखों से भरी रही। वर्ष 1952 में उन्होंने स्वयं से उम्र में काफी बड़े और शादीशुदा मशहूर निर्देशक कमाल अमरोही से विवाह किया। हालांकि, व्यक्तिगत मतभेदों, काम पर पाबंदियों और सख्त नियमों के कारण 1964 में दोनों अलग हो गए।
अकेलेपन, अनिद्रा और डिप्रेशन से जूझते हुए वे शराब की लत का शिकार हो गईं। अपने भीतर छिपे अगाध दर्द को वे अपनी कविताओं और ग़ज़लों में उकेरती थीं। वे ‘नाज़’ तखल्लुस (काव्य-उपनाम) से उर्दू में दिल छू लेने वाली शायरी लिखा करती थीं।
‘पाकीज़ा’ की अमरता और अंतिम विदा
कमाल अमरोही द्वारा निर्देशित उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘पाकीज़ा’ को बनने में लगभग 14-16 साल लगे। अलगाव और मीना कुमारी की गिरती सेहत के कारण फिल्म सालों अटकी रही, लेकिन बाद में उन्होंने गंभीर बीमारी की हालत में भी शूटिंग पूरी की।
4 फरवरी 1972 को ‘पाकीज़ा’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर कालजयी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। फिल्म में ‘साहिबजान’ के रूप में उनका अभिनय और ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा’ व ‘चलते चलते’ जैसे गीत आज भी अमर हैं।
दुर्भाग्यवश, ‘पाकीज़ा’ की रिलीज के महज दो महीने बाद ही, 31 मार्च 1972 को लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) की वजह से मात्र 38 वर्ष की अल्पायु में मुंबई में उनका निधन हो गया। पर्दे पर उदासी और संवेदनाओं की अनूठी रानी कही जाने वाली मीना कुमारी भले ही दुनिया छोड़कर चली गईं, लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा।




