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आजादी के आंदोलन की गुमनाम वीरांगना, जानिए कमला नेहरू का त्यागमय जीवन और संघर्ष

संकोची स्वभाव से राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व तक: देश की आजादी और महिला सशक्तिकरण के लिए समर्पित रहा कमला नेहरू का जीवन

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रांची: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी महान जननायकों का स्मरण किया जाता है, तो उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ी और स्वयं संघर्ष की मिसाल बनी वीरांगनाओं का जिक्र अनिवार्य हो जाता है। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की धर्मपत्नी कमला नेहरू (मूल नाम: कमला कौल) एक ऐसी ही साहसी और समर्पित स्वतंत्रता सेनानी थीं। आमतौर पर केवल ‘नेहरू जी की पत्नी’ या ‘इंदिरा गांधी की माता’ के रूप में पहचानी जाने वाली कमला नेहरू का अपना एक स्वतंत्र, निडर और ऐतिहासिक व्यक्तित्व था।

प्रारंभिक जीवन और पाश्चात्य-परंपरागत संस्कृति का मेल

1 अगस्त 1899 को दिल्ली के एक पारंपरिक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मीं कमला कौल का बचपन बेहद साधारण वातावरण में बीता था। वर्ष 1916 में मात्र 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह 26 वर्षीय जवाहरलाल नेहरू से हुआ। आनंद भवन (इलाहाबाद) के आधुनिक और पाश्चात्य जीवनशैली वाले माहौल के बीच कमला नेहरू ने खुद को बड़ी सहजता से ढाला और जल्द ही नेहरू परिवार की विचारधारा से पूरी तरह एकाकार हो गईं। 19 नवंबर 1917 को उन्होंने देश की भावी प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (इंदिरा प्रियदर्शनी) को जन्म दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका और नेतृत्व

महात्मा गांधी के विचारों से गहराई से प्रभावित होकर कमला नेहरू ने असहयोग आंदोलन (1921) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के दौरान राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने इलाहाबाद में महिलाओं का एक बड़ा संगठन तैयार किया और विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों के बहिष्कार और पिकेटिंग का नेतृत्व किया।

जब अंग्रेजों ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू सहित शीर्ष नेताओं को जेल में डाल दिया, तब कमला नेहरू ने पीछे हटने के बजाय आंदोलन की कमान संभाली। उन्होंने अपने पति के तैयार भाषणों को विशाल जनसभाओं में पढ़ा और महिलाओं को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ा। ब्रिटिश पुलिस के लाठीचार्ज और उत्पीड़न का सामना करते हुए वे दो बार जेल भी गईं।

सवारज भवन में डिस्पेंसरी और समाज सेवा

कमला नेहरू केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनमें मानवीय संवेदनाएं भी कूट-कूट कर भरी थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पुलिस की बर्बरता का शिकार हुए घायलों के इलाज के लिए उन्होंने अपने निवास स्थान ‘स्वराज भवन’ के कुछ कमरों को एक कामचलाऊ अस्पताल (डिस्पेंसरी) में बदल दिया था। वे स्वयं नर्स बनकर दिन-रात घायलों की देखभाल करती थीं। उनकी मृत्यु के बाद महात्मा गांधी की पहल पर इसी स्थान पर ‘कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल’ की स्थापना की गई।

अल्पायु में दुखद अवसान और अमर छाप

निरंतर कारावास, कठिन संघर्ष और उचित देखभाल के अभाव में कमला नेहरू का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा और वे तपेदिक (टीबी) जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गईं। बेहतर इलाज के लिए उन्हें यूरोप ले जाया गया।

अंततः 28 फरवरी 1936 को स्विट्जरलैंड के लुसाने में मात्र 36-37 वर्ष की अल्पायु में इस महान वीरांगना का निधन हो गया। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा उन्हें ही समर्पित करते हुए लिखा था-“कमला को, जो अब नहीं रही।” कमला नेहरू का जीवन भारतीय नारियों के लिए आत्म-सम्मान, साहस और राष्ट्र-समर्पण का अनुपम उदाहरण है।

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