रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक मनमानी और अवैध बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार की लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) को सिरे से खारिज करते हुए एकलपीठ के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पीड़ित नागरिक को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना किसी कानूनी अधिकार और तय प्रक्रिया के दुकान ध्वस्त करना सरकारी शक्तियों के खुले दुरुपयोग और प्रशासनिक तानाशाही का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने चतरा के उपायुक्त (DC) को सख्त आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये की मुआवजा राशि उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा कराएं। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह तय किया है कि निर्धारित समयावधि में यह राशि जमा कराने की व्यक्तिगत और सीधी जिम्मेदारी चतरा डीसी की होगी। रजिस्ट्री में पैसा जमा होने के बाद पीड़ित अपनी पहचान और बैंक विवरण जमा कर मुआवजा प्राप्त कर सकेगा।
मामला चतरा के स्थानीय निवासी राजेंद्र प्रसाद साहू (उर्फ राजेंद्र प्रसाद शौंडिक) से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2011 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में उन्होंने आरोप लगाया था कि प्लॉट संख्या-296, खाता संख्या-36 पर स्थित उनकी निजी दुकान को स्थानीय प्रशासन ने बिना किसी नोटिस या वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बुलडोजर चलाकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।
दीर्घकालिक कानूनी लड़ाई के बाद, 27 जून 2024 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि पीड़ित को दुकान निर्माण की लागत के तौर पर 5 लाख रुपये और झेली गई मानसिक प्रताड़ना के लिए 25 हजार रुपये, यानी कुल 5.25 लाख रुपये का मुआवजा 6 सप्ताह के भीतर दिया जाए। इस आदेश का पालन न होने पर पीड़ित ने अवमानना याचिका भी दायर की थी। हालांकि, जवाबदेही से बचने के लिए राज्य सरकार खंडपीठ के समक्ष अपील में चली गई।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने राज्य सरकार की इस अपील को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह अपील उन जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने के इरादे से दायर की गई थी, जिन्हें भविष्य में अपने वेतन या निजी स्तर से यह मुआवजा राशि भरे जाने का भय था। अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस मामले में कोई संशोधन किया जाता, तो वह मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए होता, क्योंकि एकलपीठ द्वारा तय की गई राशि मानसिक पीड़ा के अनुपात में पहले से ही काफी कम है।





