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डांटने से जिद्दी हो जाएगा बच्चा! 1 से 10 साल की उम्र तक ऐसे सिखाएं सही मैनर्स

स्मार्टफोन और स्क्रीन की लत के दौर में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए 1 से 10 वर्ष तक की उम्र के अनुसार सही संस्कार, मैनर्स और जीवन-मूल्य सिखाना बेहद जरूरी है।

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Lifestyle Adda: आज के आधुनिक और तकनीकी दौर में बच्चों का अधिकांश खाली समय स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी और ऑनलाइन वीडियो गेम्स की चकाचौंध में बीत रहा है। स्क्रीन के इस अत्यधिक एक्सपोजर का सीधा असर उनके स्वभाव, सामाजिक व्यवहार और मानसिक आदतों पर साफ देखा जा सकता है। ऐसे समय में माता-पिता की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है कि वे बच्चों को सही समय पर सही दिशा और मजबूत संस्कार दें। यह समझना जरूरी है कि बच्चे का पहला स्कूल उसका परिवार होता है और माता-पिता ही उसके पहले शिक्षक होते हैं। बचपन में दिए गए जीवन-मूल्य और अच्छे मैनर्स ही आगे चलकर एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।

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बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को हर उम्र के पड़ाव पर उनकी मानसिक क्षमता के अनुसार ही संस्कार और आदतें सिखाई जानी चाहिए:

1 से 2 साल: नकल और बुनियादी मैनर्स का दौर

इस शुरुआती उम्र में बच्चे जो देखते हैं, वही दोहराते हैं। वे शब्दों से ज्यादा हाव-भाव और माता-पिता के व्यवहार की नकल करके सीखते हैं। इस अवस्था में बच्चों से हमेशा प्यार और शांत आवाज में बात करें। उन्हें इशारों में अपनी जरूरत बताना और खेल-खिलौनों के जरिए सरल शब्द बोलना सिखाएं। माता-पिता को खुद घर में संयमित व्यवहार करना चाहिए क्योंकि वे ही बच्चे के सबसे बड़े रोल मॉडल होते हैं।

3 से 5 साल: शेयरिंग, ग्रीटिंग्स और जिद से निपटने का समय

इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे चीजों को काफी हद तक समझने लगते हैं, लेकिन साथ ही उनमें अपनी पसंद को लेकर जिद भी पनपने लगती है। ऐसे नाजुक मोड़ पर डांट-फटकार के बजाय धैर्य और समझदारी से काम लेना चाहिए। बच्चों को खिलौने व खाने की चीजें दूसरों के साथ शेयर करना सिखाएं। किसी से मिलने पर ‘नमस्ते’ या ‘हेलो’ और विदा लेते समय ‘बाय’ कहने की आदत डालें। अच्छी आदतों के लिए उनकी सराहना करें और छोटी-छोटी शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सिखाएं।

6 से 10 साल: सत्य, टीमवर्क और जिम्मेदारी का विकास

इस पड़ाव पर बच्चों में सही और गलत के बीच अंतर करने की समझ विकसित हो जाती है। उन्हें हमेशा सच बोलने और ईमानदारी की राह पर चलने का महत्व समझाएं। घर के छोटे-मोटे काम, जैसे अपना स्कूल बैग व्यवस्थित करना या जूते सही जगह रखना, जैसी जिम्मेदारियां सौंपें। इससे उनमें आत्मनिर्भरता आती है। बच्चों को समूह में खेलने और मिलकर काम करने (टीमवर्क) के लिए प्रेरित करें ताकि वे सामाजिक रूप से परिपक्व बन सकें। यदि वे कोई गलती करते हैं, तो सबके सामने डांटने के बजाय अकेले में शांत स्वर में समझाएं।

स्क्रीन टाइम पर अंकुश और आउटडोर गेम्स को बढ़ावा

संस्कार और नैतिक शिक्षा के साथ-साथ यह भी अनिवार्य है कि बच्चों के डिजिटल स्क्रीन टाइम की सख्त सीमा तय की जाए। दिनभर मोबाइल या टीवी में डूबे रहने से उनकी कल्पनाशक्ति, एकाग्रता और शारीरिक फिटनेस प्रभावित होती है। बच्चों को खुले मैदान में आउटडोर गेम्स, साइकिलिंग और अन्य शारीरिक गतिविधियों से जोड़ें, ताकि उनका मानसिक व शारीरिक विकास प्राकृतिक रूप से हो सके।

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