Patna: बिहार एक प्रमुख कृषि-प्रधान राज्य है, जहां राज्य की लगभग 75% से 80% आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। इसके बावजूद खेती में कम मुनाफे और स्थानीय स्तर पर सीमित अवसरों के चलते बड़ी तादाद में लोगों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता रहा है। अब इस तस्वीर को बदलने के लिए आधुनिक खेती को अधिक लाभकारी, आधुनिक और रोजगारपरक बनाने के प्रयास तेज किए गए हैं। बिहार कृषि रोड मैप के तहत आधुनिक कृषि तकनीकों और नई योजनाओं के जरिए किसानों को उन्नत खेती की ओर प्रेरित किया जा रहा है।
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स्मार्ट योजनाओं और तकनीक से लागत में कमी
राज्य सरकार किसानों को स्मार्ट कृषि प्रणालियों से जोड़ने के लिए कृषि यांत्रिकीकरण योजना, कृषि ड्रोन योजना, जैविक कॉरिडोर योजना और डीजल अनुदान जैसी कई योजनाएं चला रही है। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य खेती की लागत को घटाना और पैदावार को अधिक लाभकारी बनाना है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए बिहार कृषि स्टार्टअप नीति पर काम किया जा रहा है, जिससे युवाओं को एग्री-बिजनेस शुरू करने के नए मौके मिलेंगे।
तेलंगाना के साथ ज्ञान और अनुभव की साझेदारी
बिहार में कृषि विकास को नई गति देने के लिए दूसरे राज्यों के सफल मॉडलों को भी अपनाया जा रहा है। इसी क्रम में बिहार और तेलंगाना ने कृषि क्षेत्र में आपसी सहयोग शुरू किया है। इस साझेदारी के तहत कृषि नवाचार, किसान प्रशिक्षण, आधुनिक पद्धतियों और आजीविका के नए अवसरों को साझा किया जा रहा है, ताकि बिहार के किसान तेलंगाना के प्रौद्योगिकी आधारित अनुभवों का सीधा लाभ उठा सकें।
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किसानों की जुबानी: खुशहाली और आत्मनिर्भरता का सफर
सरकारी योजनाओं और नई तकनीकों का लाभ लेकर कई जिलों के किसान अपनी सफलता की कहानी खुद बयां कर रहे हैं:

दिलीप कुमार सिंह (समस्तीपुर) दिलीप कुमार सिंह (समस्तीपुर): “हाल ही में मुझे बीज अनुदान और गेहूं फसल क्षति की राशि मिली है। सरकारी योजनाओं से खेती में सुधार हुआ है और हम खुशहाल व आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रहे हैं।”

सुनील कुमार झा (समस्तीपुर) सुनील कुमार झा (समस्तीपुर): “मैं आधुनिक तकनीकों को अपनाकर करीब 5-6 बीघा में सब्जी की खेती कर रहा हूं। योजनाओं से काफी लाभ मिला है। अगर अधिकारी नई तकनीकों की जानकारी लगातार देते रहें तो खेती और बेहतर होगी।”

नाजबाबू प्रसाद (गोपालगंज) नाजबाबू प्रसाद (गोपालगंज): “मैंने ‘आत्मा’ से प्रशिक्षण प्राप्त कर पपीते की खेती शुरू की। विभागीय योजनाओं से खेती लाभकारी बनी है और अब मैं मशरूम उत्पादन की तैयारी कर रहा हूं।”

महेंद्र सिंह कुशवाहा (कैमूर) महेंद्र सिंह कुशवाहा (कैमूर): “गांव की चौपाल चर्चा से जुड़ने के बाद मैंने अधिकारियों की सलाह पर प्राकृतिक खेती शुरू की। गोबर की खाद के इस्तेमाल और खेत बचाओ अभियान से मेरी खेती टिकाऊ और मुनाफे वाली बन गई है।”








