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बिहार में ड्रैगन फ्रूट की खेती से बदल रही है किसानों की पहचान

बिहार में ड्रैगन फ्रूट विकास योजना के तहत 23 जिलों में खेती का विस्तार हो रहा है, जहां सरकार प्रति हेक्टेयर ₹2.70 लाख तक का अनुदान दे रही है।

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सारण जिले के दरियापुर प्रखंड के खानपुर गांव के निवासी रंजीत सिंह

Patna: बिहार के किसान अब परंपरागत फसलों के चक्र से बाहर निकलकर उच्च मूल्य वाली आधुनिक और नकदी फसलों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। कभी राज्य के जलवायु क्षेत्र के लिए असंभव मानी जाने वाली ‘ड्रैगन फ्रूट’ (कमलम) की खेती अब यहां के किसानों के लिए समृद्धि और नई पहचान का माध्यम बन चुकी है। सारण जिले के दरियापुर प्रखंड अंतर्गत खानपुर गांव निवासी कृषक रंजीत सिंह ने जैविक पद्धति से इसकी सफल पैदावार कर राज्यभर में ‘आइकन किसान’ के रूप में मिसाल पेश की है। उनके इस नवाचार पर उद्यान निदेशालय, बिहार सरकार द्वारा 40 प्रतिशत का अनुदान भी दिया गया है।

23 जिलों में विस्तार, प्रति हेक्टेयर 2.70 लाख रुपये का अनुदान

उद्यान निदेशालय, कृषि विभाग के अनुसार, ड्रैगन फ्रूट की खेती को राज्य के 23 जिलों में प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसानों की वित्तीय मदद के लिए सरकार ‘ड्रैगन फ्रूट विकास योजना’ संचालित कर रही है। इसके तहत किसान न्यूनतम 0.25 एकड़ (0.1 हेक्टेयर) से लेकर अधिकतम 5 एकड़ (2 हेक्टेयर) तक की भूमि पर योजना का लाभ उठा सकते हैं। योजना के अंतर्गत किसानों को प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 1,62,000 रुपये और द्वितीय वर्ष 1,08,000 रुपये का वित्तीय अनुदान (पौधरोपण सामग्री की कटौती के साथ) उपलब्ध कराया जा रहा है।

’21वीं सदी का चमत्कारिक फल’ और बढ़ता बाजार

औषधीय गुणों से भरपूर और कैक्टस परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस बारहमासी फल को भारत में सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते “कमलम” नाम दिया गया है। प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में इसका आयात साल 2017 में महज 327 टन था, जो 2021 में बढ़कर 15,491 टन तक पहुंच गया। बाजार में बढ़ती मांग और कम पानी की खपत के कारण यह फसल किसानों के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें शुरुआती संरचना (खंभे और रिंग) पर निवेश थोड़ा अधिक होता है, लेकिन एक बार पौधा तैयार होने के बाद यह 20 से 25 वर्षों तक निरंतर उच्च उत्पादन देता है।

किशनगंज के युवा और सफल किसानों की प्रेरक कहानी

हंसराज नखत, किशनगंज

बिहार में ड्रैगन फ्रूट का सबसे बड़ा हब किशनगंज जिला बनकर उभरा है। यहां के किसान हंसराज नखत बताते हैं कि उन्होंने आत्मा (ATMA) से प्रशिक्षण लेकर साल 2014 से इसकी खेती शुरू की थी। आज वे प्रति एकड़ लगभग 6 टन उत्पादन लेते हैं और सालाना 10 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं।

वहीं ठाकुरगंज के युवा कृष्णा पटेल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद इसे पेशेवर रूप से अपनाया। वे अपने फलों को स्थानीय मंडियों के साथ-साथ सिलीगुड़ी और पूर्णिया के बड़े बाजारों में बेचते हैं। किशनगंज के अलावा पूर्णिया, भागलपुर, खगड़िया, पूर्वी चंपारण और कैमूर जैसे जिलों में भी ड्रैगन फ्रूट की खेती का तेजी से विस्तार हो रहा है।

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