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S.I.R. नोटिस का जाल और जनता बेहाल, वोटर लिस्ट सुधार के फेर में हांफ रहा आम मतदाता

कागजी कतारों में लोकतंत्र, दफ्तरों के चक्कर, दस्तावेजों की जद्दोजहद से केंद्र सरकार के प्रति गहराता आम जन का आक्रोश

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Ranchi: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में मतदाता सूची का पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) हमेशा से एक नियमित प्रक्रिया रही है। लेकिन वर्तमान समय में विशेष गहन पुनरीक्षण (S.I.R.) के नाम पर आम मतदाताओं को जिस तरह से नोटिस थमाए जा रहे हैं, उसने देश भर के आम नागरिकों, दिहाड़ी मजदूरों, बुजुर्गों और नौकरीपेशा लोगों की कमर तोड़ दी है।
एक तरफ जहां आधुनिक डिजिटल भारत की दुहाई दी जाती है, वहीं दूसरी ओर मतदाता सूची में अपने नाम की सुरक्षा के लिए एक-एक नागरिक को दर्जनों पुराने कागज जुटाने के लिए सरकारी दफ्तरों के आगे नतमस्तक होना पड़ रहा है। इस पूरी प्रक्रिया की जटिलता ने आम जनता के पसीने छुड़ा दिए हैं और लोगों के भीतर व्यवस्था और केंद्र सरकार के प्रति भारी नाराजगी पनप रही है।

कागजी चक्रव्यूह और पसीने छूटते आम लोग

जैसे ही किसी मतदाता के घर S.I.R. का नोटिस पहुंचता है, परिवार में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। नोटिस में दिए गए कड़े प्रावधानों और सीमित समय-सीमा के कारण लोग अपना काम-धंधा, नौकरी और दैनिक मजदूरी छोड़कर सरकारी महकमों की ओर दौड़ने को मजबूर हैं।
दस्तावेजों को तैयार करने की यह राह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। मतदाताओं से सालों पुराने जन्म प्रमाण पत्र, मैपिंग रिकॉर्ड्स, 2002-2003 या उससे भी पुराने मतदाता सूचियों के अंश, माता-पिता के प्रमाण पत्र और भू-राजस्व या निवास संबंधी कागजात मांगे जा रहे हैं।
  • दस्तावेज़ जुटाने की जद्दोजहद: बाढ़, स्थानान्तरण या समय की मार के कारण जिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के पुराने कागजात नष्ट हो चुके हैं, वे तहसील और ब्लॉक दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर बेहाल हैं।
  • दफ्तरों पर काम का बोझ: गंतव्य अधिकारियों (EROs/AEROs) के दफ्तरों में घंटों लंबी कतारें लगी हैं। तपती धूप में बुजुर्ग और महिलाएं कई-कई दिनों तक कागजात जमा कराने और अपनी सुनवाई के लिए लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं।

जनता का दर्द: आखिर सजा किसकी और भुगत कौन रहा है?

सड़कों और सरकारी दफ्तरों के बाहर खड़े मतदाताओं का आक्रोश साफ तौर पर नजर आ रहा है। लोगों का कहना है कि जब सरकार के पास आधार, पैन कार्ड और डिजिटल पहचान का इतना बड़ा ढांचा मौजूद है, तो फिर मतदाता सूची के सत्यापन के लिए नागरिकों को इस कदर परेशान क्यों किया जा रहा है?
“हमें ऐसा महसूस कराया जा रहा है मानो हमें हर कुछ वर्षों में अपनी ही नागरिकता और वोट देने के अधिकार को साबित करना होगा,” यह कहना है लाइन में खड़े एक हताश बुजुर्ग मतदाता का।
रोज कमाने-खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों के लिए यह नोटिस किसी विपदा से कम नहीं है। नोटिस का जवाब देने के चक्कर में उनके कई दिनों का वेतन और रोजी-रोटी का जरिया छूट रहा है। कई मामलों में नाम और सरनेम में मामूली Spelling की गलती या शादी के बाद महिलाओं के नाम में आए बदलाव जैसी सामान्य प्रशासनिक कमियों को भी नोटिस की वजह बना दिया गया है।

केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के समक्ष यक्ष प्रश्न

S.I.R. प्रक्रिया का मूल उद्देश्य भले ही एक स्वच्छ और पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करना हो, लेकिन जिस अमलीजामे और प्रशासनिक रवैये के साथ इसे लागू किया जा रहा है, उसने लोकतंत्र के सबसे बड़े भागीदार यानी ‘आम मतदाता’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।
प्रशासनिक स्तर पर कागजी प्रक्रियाओं को सरल बनाने, डिजिटल माध्यमों का दायरा बढ़ाने तथा भौतिक सत्यापन के लिए घर-घर जाकर सुविधाएं देने के बजाय नोटिस देकर जनता पर जिम्मेदारी थोपने की प्रणाली से केंद्र सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जनता अब खुलकर यह सवाल पूछ रही है कि जब उनके पास भारत का वैध नागरिक होने के तमाम पहचान पत्र उपलब्ध हैं, तो फिर उन्हें वोट के अधिकार के लिए इस तरह ‘हांफने’ और प्रताड़ित होने पर मजबूर क्यों किया जा रहा है?
यदि सरकार और चुनाव आयोग ने समय रहते इन विसंगतियों पर ध्यान नहीं दिया और प्रक्रिया को जन-अनुकूल नहीं बनाया, तो आम जनता का यह पसीना और नाराजगी आने वाले समय में एक बड़े जन-आक्रोश का रूप ले सकती है।
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