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Ranchi: अक्सर लोग याज़ीद और यज़ीदी का नाम सुनकर समझते हैं कि दोनों का आपस में कोई रिश्ता होगा। वजह सिर्फ़ इतनी है कि दोनों के नाम मिलते-जुलते हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि याज़ीद और यज़ीदी दोनों बिल्कुल अलग चीज़ें हैं। एक तरफ़ याज़ीद एक ऐतिहासिक क्रूर शख्सियत में माना जाता है, जबकि दूसरी तरफ़ यज़ीदी एक बहुत पुरानी धार्मिक क़ौम है। आइए आसान ज़ुबान में समझते हैं कि दोनों के बीच क्या फर्क है और इनके बारे में इतना विवाद क्यों होता है।
याज़ीद कौन था?
याज़ीद इब्न मुआविया उमय्यद सल्तनत का दूसरा ख़लीफ़ा था। उसका दौर 680 ईस्वी से 683 ईस्वी तक रहा। इस्लामी तारीख़ में उसका नाम सबसे ज़्यादा कर्बला के वाक़िए की वजह से लिया जाता है।
जब याज़ीद ख़लीफ़ा बना तो उसने मुसलमानों से अपनी बैअत (वफ़ादारी की क़सम) लेने की कोशिश की। लेकिन हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.), जो हज़रत अली (रज़ि.) और हज़रत फ़ातिमा (रज़ि.) के बेटे और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे थे, उन्होंने याज़ीद की बैअत करने से इंकार कर दिया।
इसके बाद 10 मुहर्रम, 61 हिजरी (680 ईस्वी) को इराक़ के कर्बला मैदान में इमाम हुसैन (रज़ि.) और उनके बहुत कम साथियों का याज़ीद की फ़ौज से सामना हुआ। इस जंग में इमाम हुसैन (रज़ि.) और उनके अहले-बैत व साथियों ने शहादत हासिल की।
यही वाक़िया इस्लामी तारीख़ के सबसे दर्दनाक हादसों में गिना जाता है। खास तौर पर शिया मुसलमान इसे ग़म और सब्र की सबसे बड़ी मिसाल मानते हैं। वहीं सुन्नी मुसलमान भी कर्बला की इस त्रासदी को बेहद अफ़सोसनाक मानते हैं और इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत का सम्मान करते हैं, हालांकि याज़ीद के बारे में अलग-अलग विद्वानों की राय अलग हो सकती है।
यज़ीदी कौन हैं?
अब बात करते हैं यज़ीदी की।
यज़ीदी कोई एक आदमी का नाम नहीं, बल्कि एक धार्मिक और नस्ली (एथनिक) समुदाय है। यह क़ौम ज़्यादातर उत्तरी इराक़ के सिंजार इलाक़े और उसके आसपास रहती है। इसके अलावा सीरिया, तुर्किये, आर्मेनिया और यूरोप के कुछ देशों में भी यज़ीदी आबादी मौजूद है।
यज़ीदी धर्म बहुत पुराना माना जाता है। इसकी अपनी अलग धार्मिक मान्यताएं, रस्में और परंपराएं हैं। यह न पूरी तरह इस्लाम है, न ईसाई धर्म और न ही यहूदी धर्म। इसमें कई प्राचीन मेसोपोटामियाई और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के असर भी दिखाई देते हैं।
यज़ीदी समुदाय में मलिक ताऊस को बहुत अहम मुक़ाम हासिल है। उन्हें एक मुक़द्दस फ़रिश्ते के तौर पर माना जाता है, जो अल्लाह के हुक्म से दुनिया की निगरानी करता है।
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“शैतान की पूजा” वाला इल्ज़ाम क्यों लगा?
यज़ीदी समुदाय पर सदियों से सबसे बड़ा इल्ज़ाम यह लगाया जाता रहा है कि वे “शैतान की पूजा” करते हैं। इसकी वजह उनके धर्म में मलिक ताऊस (Peacock Angel) की अहमियत है।
यज़ीदी मान्यताओं के मुताबिक, मलिक ताऊस ख़ुदा के सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद फ़रिश्तों (या फ़रिश्ता-समान दूत) में से एक हैं। उनकी धार्मिक परंपरा में एक रिवायत मिलती है कि जब ख़ुदा ने इंसान को बनाया और दूसरे फ़रिश्तों से उसके आगे झुकने का कहा, तब मलिक ताऊस ने इंकार किया। लेकिन यह इंकार बग़ावत नहीं, बल्कि सिर्फ़ ख़ुदा के सामने ही सिर झुकाने की वफ़ादारी का इम्तिहान था। यज़ीदी मान्यता के अनुसार, ख़ुदा इससे राज़ी हुआ और मलिक ताऊस को सबसे ऊँचा दर्जा दिया।
वहीं इस्लामी मान्यता इससे अलग है। क़ुरआन के मुताबिक, जब अल्लाह ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को पैदा किया, तो फ़रिश्तों को उन्हें सज्दा करने का हुक्म दिया गया। सभी ने अल्लाह का हुक्म माना, लेकिन इब्लीस ने घमंड की वजह से सज्दा करने से इंकार कर दिया। इसी नाफ़रमानी के कारण उसे अल्लाह की रहमत से दूर कर दिया गया और वह शैतान कहलाया।
इसी समानता की वजह से कुछ मुस्लिम विद्वानों और आलोचकों ने मलिक ताऊस को इब्लीस से जोड़कर देखा और यह धारणा बनी कि यज़ीदी दरअसल शैतान की इबादत करते हैं।
हालांकि यज़ीदी समुदाय इस बात को पूरी तरह ख़ारिज करता है। उनका कहना है कि मलिक ताऊस का इब्लीस या शैतान से कोई संबंध नहीं है। उनके अनुसार, बाहरी लोगों ने उनकी धार्मिक मान्यताओं को इस्लामी नज़रिए से समझने की कोशिश की, जिससे यह गलतफ़हमी पैदा हुई।
इसी वजह से आज अधिकांश इतिहासकार और धर्म-अध्येता यह मानते हैं कि यज़ीदियों को सीधे तौर पर “शैतान-पूजक” कहना उनके धर्म की सही व्याख्या नहीं है। यह आरोप मुख्यतः अलग-अलग धार्मिक परंपराओं की भिन्न मान्यताओं और ऐतिहासिक गलतफ़हमियों से जुड़ा हुआ है।
यज़ीदी समुदाय पर हुए ज़ुल्म
साल 2014 में आतंकवादी संगठन ISIS (दाइश) ने यज़ीदी समुदाय पर बहुत बड़े पैमाने पर हमले किए। हज़ारों लोगों की हत्या कर दी गई, महिलाओं और बच्चियों का अपहरण किया गया और उन्हें ग़ुलाम बनाया गया। लाखों लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा।
इन घटनाओं को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों ने इंसानियत के ख़िलाफ़ गंभीर अपराध और नरसंहार (Genocide) माना। आज भी बहुत से यज़ीदी अपने घरों में वापस नहीं लौट पाए हैं और पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
क्या याज़ीद और यज़ीदी का कोई रिश्ता है?
इस सवाल का सीधा जवाब है—नहीं।
दोनों के नाम भले ही मिलते-जुलते हों, लेकिन दोनों का इतिहास, पहचान और धार्मिक पृष्ठभूमि पूरी तरह अलग है।
याज़ीद एक ऐतिहासिक क्रूर शख्सियत था, जिसका नाम कर्बला के वाक़िए से जुड़ा है। जबकि यज़ीदी एक अलग धार्मिक समुदाय है, जिसका अपना मज़हब, अपनी परंपराएं और अपनी पहचान है। इतिहासकारों में भी इस बात पर कोई ठोस सहमति नहीं है कि यज़ीदी समुदाय का नाम याज़ीद इब्न मुआविया से निकला है। आम तौर पर दोनों को अलग-अलग पहचान के रूप में ही देखा जाता है।
याज़ीद और यज़ीदी के नामों की समानता की वजह से अक्सर लोग भ्रम में पड़ जाते हैं, लेकिन दोनों का आपस में कोई सीधा संबंध नहीं है। याज़ीद इस्लामी इतिहास की एक विवादित शख्सियत है, जबकि यज़ीदी एक प्राचीन धार्मिक समुदाय है जिसने सदियों तक भेदभाव और उत्पीड़न झेला है।
इसलिए जब भी इन दोनों का ज़िक्र हो, तो सिर्फ़ नाम देखकर नतीजा निकालने के बजाय उनके इतिहास और पहचान को सही संदर्भ में समझना ज़रूरी है। सही जानकारी ही गलतफ़हमियों को दूर कर सकती है और इतिहास को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है।

