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9 अगस्त 1942 की वह ऐतिहासिक भोर, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव

भारत छोड़ो आंदोलन दिवस (अगस्त क्रांति), 'करो या मरो' का शंखनाद, जानिए कैसे एक जनक्रांति ने भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया

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रांची: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त का दिन स्वर्णिम और सबसे प्रखर अक्षरों में दर्ज है। इसे पूरा देश ‘अगस्त क्रांति दिवस’ के रूप में मनाता है। यही वह ऐतिहासिक अवसर था, जब वर्ष 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के एक आह्वान पर पूरा भारत अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ तथा ‘करो या मरो’ की हुंकार से पूरा देश गूंज उठा था। यह आंदोलन भारतीय स्वाधीनता संग्राम का अंतिम और सबसे बड़ा जनआंदोलन साबित हुआ, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया।

आंदोलन की पृष्ठभूमि: क्रिप्स मिशन की विफलता और वैश्विक दबाव

द्वितीय विश्व युद्ध के समय (1939-1945) दुनिया की परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं और जनता की मर्जी के बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया था। एक ओर जहां मित्र राष्ट्र (अमेरिका, रूस और चीन) ब्रिटेन पर भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने का दबाव बना रहे थे, वहीं जापानी सेनाएं भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा के करीब पहुंच रही थीं।

भारतीयों में गहरा असंतोष व्याप्त था। इस गतिरोध को सुलझाने के लिए मार्च 1942 में स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में ‘क्रिप्स मिशन’ भारत आया। हालांकि, अंग्रेजों की मंशा भारतीयों को पूर्ण स्वतंत्रता देने की नहीं थी, बल्कि वे गवर्नर जनरल के अधिकारों और रक्षा व्यवस्था को अपने पास रखना चाहते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और प्रमुख नेताओं ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया। क्रिप्स मिशन की नाकामी ने यह साफ कर दिया कि अंग्रेजों से बातचीत के जरिए पूर्ण स्वराज पाना संभव नहीं है।

8 अगस्त की ऐतिहासिक रात और ‘करो या मरो’ का नारा

8 अगस्त 1942 को बॉम्बे (अब मुंबई) के ऐतिहासिक गोवालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया गया। जनसभा को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने देशवासियों को एक अमर मंत्र दिया-“करो या मरो” (Do or Die)। गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे, लेकिन अपनी गुलामी को देखने के लिए जिंदा नहीं रहेंगे।
एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि ‘भारत छोड़ो’ (Quit India) शब्द का पहला विचार स्वयं गांधीजी का नहीं था, बल्कि मुंबई के तत्कालीन मेयर और प्रमुख समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली ने इस प्रभावशाली नारे की रचना की थी। गांधीजी ने इस नारे को सहजता से स्वीकार किया और यह पूरे राष्ट्र का स्वर बन गया।

ऑपरेशन ज़ीरो आवर और जनक्रांति का विस्फोट

ब्रिटिश हुकूमत गांधीजी के इस आह्वान से थर्रा उठी। आंदोलन को अंकुरित होने से पहले ही कुचलने की नीयत से अंग्रेजी सरकार ने 9 अगस्त 1942 की भोर में ही ‘ऑपरेशन ज़ीरो आवर’ (Operation Zero Hour) चला दिया। सूर्योदय से पहले ही महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और राजेंद्र प्रसाद समेत कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। महात्मा गांधी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया, जबकि अन्य नेताओं को अहमदनगर के किले में कैद कर दिया गया।
अंग्रेजों का मानना था कि शीर्ष नेतृत्व को सलाखों के पीछे भेजकर वे आंदोलन को दबा देंगे, लेकिन नतीजा उनकी सोच के ठीक विपरीत निकला। नेतृत्वविहीन होने के बावजूद भारत की जनता स्वयं अपनी नेता बन गई। यह एक अभूतपूर्व स्वतःस्फूर्त जनक्रांति में बदल गया।

युवा और नारी शक्ति की मिसाल

9 अगस्त की सुबह जब पुलिस का सख्त पहरा था, तब 33 वर्षीया वीरांगना अरुणा आसफ अली ने निर्भीकता का परिचय देते हुए गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया। उनके इस अदम्य साहस के कारण उन्हें इतिहास में ‘अगस्त क्रांति की ग्रैंड ओल्ड लेडी’ के नाम से जाना गया।
देश भर में युवाओं, छात्रों, मजदूरों और किसानों ने आंदोलन का झंडा संभाल लिया। जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, उषा मेहता और अच्युत पटवर्धन जैसे युवा नेताओं ने भूमिगत होकर आंदोलन का संचालन किया। उषा मेहता ने गुप्त ‘कांग्रेस रेडियो’ की शुरुआत की, जिसने देशवासियों तक आजादी का संदेश पहुंचाया।
देश के कोने-कोने में बलिदान की गाथाएं लिखी गईं। बंगाल के तामलुक में 73 वर्षीय वृद्धा मतंगिनी हाजरा हाथों में तिरंगा लिए गोलियों का सामना करते हुए शहीद हुईं, वहीं असम की 13 वर्षीय बालिका कनकलता बरुआ ने जुलूस का नेतृत्व करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। बिहार के पटना में सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए सात युवा छात्र पुलिस की गोलियों का शिकार हुए। महाराष्ट्र के नंदुरबार में मात्र 16 वर्ष के छात्र शिरीष कुमार ने अपने स्कूली साथियों के साथ सीने पर गोली खाई।

आंदोलन का असर और आजादी का मार्ग

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए लाठीचार्ज, अंधाधुंध गोलीबारी और सामूहिक गिरफ्तारियों का सहारा लिया। लगभग 1 लाख से अधिक लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया और हजारों देशभक्त शहीद हो गए। बलिया (उत्तर प्रदेश), तामलुक (बंगाल) और सतारा (महाराष्ट्र) जैसे स्थानों पर जनता ने अंग्रेजी हुकूमत को बेदखल कर अपनी समानांतर सरकारें तक स्थापित कर ली थीं।
यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने बलपूर्वक आंदोलन को कुछ समय के लिए दबा दिया, लेकिन इस संग्राम ने अंग्रेजों को यह कड़वा सच समझा दिया कि अब भारतीय जनता पर उसकी इच्छा के विरुद्ध शासन करना नामुमकिन है। भारतीय सेना और पुलिस के भीतर भी देशभक्ति की लहर दौड़ गई, जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव पूरी तरह हिला दी।
9 अगस्त का दिन केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं है, बल्कि यह भारत के अदम्य आत्मबल, त्याग और सामूहिक संकल्प का प्रतीक है। ‘अगस्त क्रांति’ ने जो ज्वाला भड़काई थी, उसी की परिणति 5 वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के रूप में हुई। आज का स्वतंत्र भारत उन महान अमर शहीदों और अनगिनत गुमनाम नायकों का सदैव ऋणी रहेगा, जिन्होंने ‘करो या मरो’ का संकल्प लेकर हमें आजादी की खुली हवा में सांस लेने का अधिकार दिया।
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