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26 सितंबर: धरती की सेहत और मूक-बधिर समुदाय के अधिकारों को सशक्त बनाने का संकल्प

एक तारीख, दो बड़े संकल्प, नया मोड़, नया संकल्प: विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस और विश्व मुख बधिर दिवस पर बदलाव की पुकार

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Ranchi: हर साल 26 सितंबर का दिन वैश्विक कैलेंडर में एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह तारीख समाज, प्रकृति और समावेशिता के दो ऐसे प्रमुख पहलुओं को एक मंच पर लाती है, जिन पर तुरंत ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। एक तरफ जहां पूरा विश्व ‘विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस’ (World Environmental Health Day) मनाकर इंसानी सेहत और पर्यावरण के अटूट रिश्ते को समझता है, वहीं दूसरी तरफ ‘विश्व मुख बधिर दिवस’ (World Deaf Day) के जरिए उन लाखों-करोड़ों आवाजों को अधिकार और पहचान दिलाने का प्रयास किया जाता है जो बिना बोले भी समाज का अभिन्न हिस्सा हैं।
यह दिन केवल औपचारिक रूप से किसी तारीख को याद करने का नहीं है, बल्कि यह समय है आत्ममंथन करने का कि हम किस तरह के समाज और पर्यावरण का निर्माण कर रहे हैं। आइए विस्तार से समझें कि 26 सितंबर को मनाए जाने वाले इन दोनों महत्वपूर्ण अवसरों का मूल उद्देश्य, इतिहास और हमारे जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव क्या है।

जब धरती सांस लेगी, तभी मानव जीवन मुस्कुराएगा

पर्यावरण और इंसान का संबंध केवल एक स्थान साझा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारा अस्तित्व पूरी तरह से हमारे आसपास की आबो-हवा पर निर्भर करता है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ एनवायरनमेंटल हेल्थ (IFEH) ने वर्ष 2011 में 26 सितंबर को ‘विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस’ के रूप में मनाने की आधिकारिक घोषणा की थी। इस दिन को मनाने के पीछे की मूल सोच यह थी कि जब तक हमारा पर्यावरण सुरक्षित और स्वस्थ नहीं रहेगा, तब तक मानव जीवन को बीमारियों से मुक्त नहीं रखा जा सकता।

पर्यावरण स्वास्थ्य का सीधा गणित

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 24% से 25% बीमारियों और मौतों का सीधा कारण पर्यावरणीय खतरे हैं—जैसे दूषित हवा, जहरीला पानी, रासायनिक अपशिष्ट और जलवायु परिवर्तन। जब हम वायु प्रदूषण की बात करते हैं, तो यह केवल फेफड़ों की बीमारी तक सीमित नहीं रहता; यह दिल के दौरों, मस्तिष्क की समस्याओं और बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास में रुकावट का कारण बनता है।
इसी प्रकार, जल स्रोतों में मिलने वाले प्लास्टिक, औद्योगिक रसायन और अपशिष्ट भोजन आपूर्ति श्रृंखला को जहरीला बना रहे हैं। ‘पर्यावरण स्वास्थ्य’ का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि:
  • हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वह जहर-मुक्त हो।
  • पीने का पानी स्वच्छ और रोगाणु-मुक्त हो।
  • खाद्य पदार्थ सुरक्षित और रसायन-मुक्त मिट्टी में उगाए गए हों।
  • कचरा प्रबंधन (Waste Management) वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीकों से किया जाए।

विज्ञान और नीति का समावेश

वैश्विक स्तर पर पर्यावरण स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें सरकारों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं की बड़ी भूमिका होती है। वैज्ञानिक शोध हमें बताते हैं कि किस तरह औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाला धुआँ और सूक्ष्म कण (PM2.5) हमारी उम्र घटा रहे हैं। इन वैज्ञानिक तथ्यों को नीतियों में बदलकर ही हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित ग्रह छोड़ सकते हैं।

खामोशी को समझें, अधिकारों का सम्मान करें

26 सितंबर का दूसरा सबसे बड़ा पहलू है ‘विश्व मुख बधिर दिवस’ (World Deaf Day)। आमतौर पर सितंबर के अंतिम सप्ताह को ‘अंतर्राष्ट्रीय बधिर सप्ताह’ (International Week of the Deaf) के रूप में मनाया जाता है और 26 सितंबर का दिन इसमें एक विशेष स्थान रखता है। विश्व बधिर संघ (World Federation of the Deaf – WFD) की स्थापना के उपलक्ष्य में शुरू हुई यह पहल आज दुनिया भर में बधिर और सुनने में असमर्थ लोगों के मानवाधिकारों, उनकी सांकेतिक भाषा (Sign Language) और उनके सामाजिक समावेशन का सबसे सशक्त प्रतीक बन चुकी है।

70 मिलियन से अधिक आवाज़ें: क्या हम सुन रहे हैं?

विश्व स्तर पर 7 करोड़ से अधिक लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से सुनने की क्षमता से वंचित हैं। इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक लोग विकासशील देशों में रहते हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं, विशेष शिक्षा और रोजगार के अवसरों की भारी कमी है।
विश्व मुख बधिर दिवस का सबसे प्रमुख संदेश है कि “बधिर होना कोई लाचारी या अपंगता नहीं है, बल्कि यह एक अलग भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है।” जब तक समाज इस बात को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक हम एक समान और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकते।

सांकेतिक भाषा: एक अधिकार, न कि कोई एहसान

इस दिन का मुख्य ध्यान ‘सांकेतिक भाषा’ (Sign Language) को बढ़ावा देने पर होता है। जैसे हिंदी, अंग्रेजी या कोई अन्य भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, वैसे ही सांकेतिक भाषा भी एक पूर्ण और समृद्ध भाषा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, बधिर व्यक्तियों को उनकी मातृभाषा के रूप में सांकेतिक भाषा में शिक्षा पाने और सरकारी व सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच का पूरा अधिकार है।
बधिर समुदाय को जिन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनमें शामिल हैं:
  1. शिक्षा में बाधाएं: सांकेतिक भाषा में प्रशिक्षित शिक्षकों और अध्ययन सामग्री की कमी।
  2. रोजगार में भेदभाव: योग्यता होने के बावजूद संवाद की आड़ में अवसरों से वंचित किया जाना।
  3. सार्वजनिक स्थानों पर पहुंच का अभाव: अस्पतालों, अदालतों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी दफ्तरों में साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर (व्याख्याकार) का न होना।
  4. सामाजिक अलगाव: समाज की उदासीनता के कारण अकेलापन और मानसिक तनाव।

दो संकल्पों का एक साझा पथ: एक बेहतर और समावेशी भविष्य

पहली नज़र में ऐसा लग सकता है कि ‘पर्यावरण स्वास्थ्य’ और ‘मुख बधिर अधिकार’ दो बिल्कुल अलग विषय हैं। लेकिन गहराई से देखें, तो दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—इंसानी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना और हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर देना।
एक तरफ जहां दूषित पर्यावरण हर किसी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, वहीं इसका सबसे बुरा असर समाज के उन वर्गों पर पड़ता है जो पहले से ही संवेदनशील हैं—चाहे वे दिव्यांग जन हों, बच्चे हों या आर्थिक रूप से कमजोर लोग। उदाहरण के लिए, अत्यधिक वायु और ध्वनि प्रदूषण न केवल सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को और गंभीर बना देता है।

हमारा कर्तव्य: एक नागरिक के रूप में हम क्या कर सकते हैं?

26 सितंबर केवल भाषणों या लेखों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन हमसे व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर बदलाव की मांग करता है:
  • पर्यावरण के लिए:

    • प्लास्टिक का उपयोग न्यूनतम करें और कचरे का सही निपटान करें।
    • अपने दैनिक जीवन में पानी और ऊर्जा की बचत करें।
    • अपने आसपास पेड़-पौधे लगाएं और हरित क्षेत्रों का संरक्षण करें।
    • सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग कर वायु प्रदूषण घटाने में योगदान दें।
  • मुख बधिर समुदाय के लिए:

    • सांकेतिक भाषा के बुनियादी संकेतों (Basic Signs) को सीखने का प्रयास करें।
    • अपने कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में बधिर व्यक्तियों के लिए सुलभ माहौल (Accessibility) तैयार करें।
    • संवाद में धैर्य रखें और उन्हें सहानुभूति की जगह समानता और अवसर दें।
    • सार्वजनिक मंचों पर उनके अधिकारों और सांकेतिक भाषा की मान्यता की वकालत करें।
26 सितंबर का यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व केवल हमारे अपने स्वार्थों से नहीं बंधा है। हमारी जिम्मेदारी उस प्रकृति के प्रति भी है जो हमें जीवन देती है, और उस मानव समाज के प्रति भी जिसके हर सदस्य को बराबरी से जीने का हक है। जब हम स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और सुरक्षित पर्यावरण का निर्माण करेंगे, और साथ ही हर खामोश आवाज को अपनाकर उसे समाज की मुख्यधारा में लाएंगे, तभी हम वास्तव में एक स्वस्थ, समृद्ध और समावेशी विश्व का निर्माण कर सकेंगे। आइए, इस 26 सितंबर को हम अपनी धरती को हरा-भरा व सुरक्षित बनाने और मूक-बधिर भाई-बहनों के अधिकारों का सम्मान करने का दोहरा संकल्प लें।
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