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ईश्वर चंद्र विद्यासागर जयंती: झारखंड की माटी से जुड़ाव और ‘नंदन कानन’ के समर्पण की अमर गाथा

बंगाल पुनर्जागरण से जामताड़ा के जंगलों तक, जब विद्यासागर ने संथालों की सेवा को बनाया जीवन का अंतिम महासंकल्प

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Ranchi: 26 सितंबर का दिन भारतीय इतिहास और आधुनिक भारतीय समाज के निर्माण में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है। यह वही ऐतिहासिक तारीख है जब 1820 में पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के बीरसिंह गांव में ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय, जिन्हें दुनिया ‘ईश्वर चंद्र विद्यासागर’ के नाम से जानती है, का जन्म हुआ था। राजा राममोहन राय के बाद यदि 19वीं सदी के बंगाल पुनर्जागरण (Bengal Renaissance) को आगे बढ़ाने और समाज की कुप्रथाओं को उखाड़ फेंकने का श्रेय किसी महान व्यक्तित्व को जाता है, तो वे विद्यासागर जी ही थे। उन्होंने न केवल शिक्षा का विस्तार किया, बल्कि विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित करवाकर महिलाओं को सम्मान और अधिकार दिलाए।

लेकिन विद्यासागर जी के जीवन का एक ऐसा स्वर्णिम और संवेदनशील पहलू भी है, जो झारखंड की पावन धरा से बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है। अपने जीवन के अंतिम 18 से 20 वर्षों का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने झारखंड (तत्कालीन अविभाजित बंगाल का संथाल परगना) के जामताड़ा जिले स्थित कर्माटांड में बिताया था। यह स्थान उनके लिए केवल एक विश्राम स्थल नहीं था, बल्कि उनकी निस्वार्थ जनसेवा और सामाजिक न्याय की मुख्य कर्मभूमि बना।

                          ईश्वर चंद्र विद्यासागर

स्ट्रीट लाइट की रोशनी से ‘ज्ञान के सागर’ तक का सफर

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का बचपन भीषण आर्थिक तंगहाली में बीता। घर में दीया जलाने के लिए तेल के पैसे न होने पर वे सड़कों की स्ट्रीट लाइट के खंभों के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई करते थे। उनकी असाधारण प्रतिभा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1839 में संस्कृत और दर्शनशास्त्र की कठिन प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण करने पर विद्वानों ने उन्हें ‘विद्यासागर’ (ज्ञान का सागर) की उपाधि से विभूषित किया। मात्र 21 वर्ष की आयु में वे फोर्ट विलियम कॉलेज में विभागाध्यक्ष बने और बाद में संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बनकर शिक्षा में ऐतिहासिक सुधार किए। उन्होंने ‘वर्ण परिचय’ पुस्तक लिखकर बांग्ला वर्णमाला को नया और आधुनिक रूप दिया, जिससे उन्हें ‘बांग्ला गद्य का जनक’ भी कहा जाता है।

कोलकाता की भागदौड़ से कर्माटांड का रुख: स्वास्थ्य और शांति की तलाश

वर्ष 1873-1874 के आसपास, कोलकाता के व्यस्त जीवन, समाज सुधार आंदोलनों के तनाव, गिरते स्वास्थ्य और तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के विरोध से व्यथित होकर विद्यासागर जी ने शांत वातावरण की तलाश की। इसी दौरान वे जामताड़ा के कर्माटांड पहुंचे। कर्माटांड की शांत आबो-हवा में पहुंचकर जब उन्होंने स्थानीय संथाल जनजातीय समुदाय के दयनीय जीवन, गरीबी, अंधविश्वास और शिक्षा के अभाव को देखा, तो उनका करुणा से भरा हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने तय किया कि वे अपना समय, ज्ञान और संसाधन इस उपेक्षित समुदाय के उत्थान में ही लगाएंगे।

               कर्माटांड स्थित विद्यासागर रेलवे स्टेशन

संथाल समुदाय के लिए किए गए ऐतिहासिक और अनुकरणीय कार्य

1. मुफ़्त होम्योपैथिक चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा

उस दौर में संथाल परगना के ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर थीं। बीमारी की स्थिति में लोग अंधविश्वास या झाड़-फूंक के सहारे रहते थे। विद्यासागर जी ने स्वयं होम्योपैथी डॉक्टरी का गहन अध्ययन किया और कर्माटांड में एक मुफ़्त होम्योपैथिक क्लिनिक की शुरुआत की। वे खुद कोलकाता से दवाइयां मंगवाते थे और रोजाना घंटों बैठकर संथालों का इलाज करते थे। यहां तक कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों का हाल जानने के लिए वे स्वयं पैदल चलकर उनकी झोपड़ियों तक जाते थे और उन्हें मुफ़्त दवा व पौष्टिक आहार देते थे।

2. संथाल बालिकाओं और बच्चों के लिए शिक्षा का दीप

विद्यासागर जी का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा ही समाज सुधार की सबसे बड़ी कुंजी है। उन्होंने कर्माटांड में संथाल बच्चों, विशेषकर बालिकाओं के लिए एक प्राथमिक विद्यालय खोला। उस युग में जनजातीय समाज में लड़कियों की शिक्षा की कोई सोच नहीं थी, लेकिन उन्होंने उनके माता-पिता को समझा-बुझाकर बच्चों को स्कूल भेजना शुरू करवाया। वे बच्चों को मुफ़्त में पुस्तकें, स्लेट, कपड़े और नाश्ता भी प्रदान करते थे।

                    कर्माटांड स्थित ‘नंदन कानन’

3. आत्मसम्मान के साथ आर्थिक सहायता: मकई के भुट्टों का किस्सा

संथाल समुदाय की अत्यंत निर्धनता को देखकर विद्यासागर जी उनकी मदद करना चाहते थे, लेकिन वे उनके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक अनोखा तरीका निकाला। जब संथाल किसान अपने खेतों में उगे मकई के भुट्टे बेचने आते, तो विद्यासागर जी बाजार दर से दोगुनी या तिगुनी कीमत देकर उनसे भुट्टे खरीद लेते थे। इसके बाद उन भुट्टों को गांव के ही भूखे बच्चों और बुजुर्गों में बांट देते थे। इस प्रकार वे बिना दान का अहसास कराए उनकी आर्थिक मदद कर पाते थे।

4. ‘नंदन कानन’ का निर्माण और पर्यावरण संरक्षण

कर्माटांड में उन्होंने एक विशाल परिसर खरीदा, जिसे उन्होंने ‘नंदन कानन’ नाम दिया। इस परिसर में उन्होंने आम, लीची, कटहल और विभिन्न औषधीय पौधे लगाए। इस बगीचे का मुख्य उद्देश्य संथाल लोगों को फल-फूल उपलब्ध कराना और पर्यावरण का संरक्षण करना था।

5. सामाजिक समरसता और आत्मीयता

विद्यासागर जी ने जात-पात और छुआछूत के बंधनों को पूरी तरह नकार दिया था। वे संथाल आदिवासियों के घर जाते, उनके साथ जमीन पर बैठकर खाना खाते और उनके हर सुख-दुख में शरीक होते थे। जब कोलकाता से उच्च वर्ग के लोग उनसे मिलने आते, तो वे बड़े गर्व से संथालों का परिचय अपने “आत्मीय परिजनों” के रूप में करवाते थे।

            कर्माटांड स्थित विद्यासागर रेलवे स्टेशन

कर्माटांड में उनकी अमर विरासत: ‘विद्यासागर’ नामकरण

संथाल समुदाय के प्रति उनकी इस अटूट सेवा भावना के कारण ही कर्माटांड के लोग उन्हें ईश्वर का अवतार मानने लगे थे। उनके इस अभूतपूर्व योगदान को अक्षुण्ण रखने के लिए भारतीय रेलवे और प्रशासन ने कर्माटांड रेलवे स्टेशन और प्रखंड का नाम बदलकर ‘विद्यासागर’ कर दिया।

‘नंदन कानन’ की वर्तमान स्थिति: एक जीवंत प्रेरणा केंद्र

1891 में विद्यासागर जी के निधन के बाद यह ऐतिहासिक संपत्ति निजी हाथों में जाने के कारण बिकने की कगार पर पहुंच गई थी। वर्ष 1974 में ‘बिहार बंगाली एसोसिएशन’ और ‘विद्यासागर स्मृतिरक्षा समिति’ ने घर-घर जाकर एक-एक रुपये का चंदा इकट्ठा कर इस धरोहर को खरीदा और संरक्षित किया।

आज कर्माटांड स्थित ‘नंदन कानन’ (विद्यासागर भवन) की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है:

मूल धरोहर का संरक्षण: विद्यासागर जी का मूल निवास भवन आज भी उसी सादगी से संरक्षित है। यहां उनकी 140 वर्ष से अधिक पुरानी ऐतिहासिक ‘पालकी’ रखी हुई है, जिससे वे गांवों में घूमकर सेवा कार्य करते थे।

बालिकाओं के लिए निःशुल्क विद्यालय: उनके शिक्षा के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए परिसर में आज भी ‘विद्यासागर बालिका प्राथमिक विद्यालय’ संचालित है, जहां मुख्य रूप से जनजातीय बच्चों को पढ़ाया जाता है।

निःशुल्क होम्योपैथी क्लिनिक: उनकी ही परंपरा को जीवित रखते हुए आज भी यहां निर्धन लोगों के लिए निःशुल्क होम्योपैथी क्लिनिक चलाया जा रहा है।

पर्यटन व प्रेरणा स्थल: हर वर्ष 26 सितंबर को उनकी जयंती और 29 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर यहां राजकीय व सामाजिक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

26 सितंबर को ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी की जयंती मनाना केवल एक महान नायक को याद करना नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित मूल्यों को जीवन में उतारना है। झारखंड के कर्माटांड की माटी पर उनके द्वारा किए गए सेवा कार्य हमें सिखाते हैं कि निस्वार्थ करुणा, शिक्षा का प्रसार और समाज के सबसे पिछड़े वर्ग को गले लगाना ही सच्ची मानवता है।

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