PATNA: पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए बिहार के सहरसा जिले ने नवाचार की अनूठी मिसाल पेश की है। जिले की 21 ग्राम पंचायतों में स्थापित कचरा प्रसंस्करण इकाइयों (WPU) में नाडेप और कम्पोस्ट पिट के जरिए जैविक कचरे का निस्तारण कर वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया जा रहा है। इसी जैविक खाद का उपयोग कर वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट परिसरों में ही पौधों की शानदार नर्सरी विकसित की जा रही है। इससे पंचायतों में ‘कचरे से खाद, खाद से नर्सरी और नर्सरी से कमाई’ का एक आत्मनिर्भर और प्रभावी मॉडल खड़ा हो गया है।
पहले जो डब्ल्यूपीयू परिसर अक्सर कचरे और गंदगी से पटे रहते थे, वे अब लहलहाती नर्सरी की वजह से सुंदर और हरे-भरे दिखने लगे हैं। रासायनिक खादों के बजाय जैविक खाद के उपयोग से इन नर्सरियों में तैयार पौधों की गुणवत्ता बेहतर है और उनकी ग्रोथ भी काफी तेजी से हो रही है। इसके साथ ही जैविक कम्पोस्ट के इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना मजबूत हुई है और उसकी जल सोखने की क्षमता भी बढ़ी है। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि जैविक कचरे का समय पर निस्तारण होने से गांव साफ-सुथरे बने हैं और मौसमी बीमारियों का खतरा भी घटा है।
यह मॉडल गांवों को ‘ग्रीन विलेज’ बनाने में मददगार साबित हो रहा है। पंचायतों में उगाई जा रही इस नर्सरी के पौधों को बेचकर हर साल 30 से 40 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। इस राशि का इस्तेमाल लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (LSBA) के तहत डब्ल्यूपीयू, पैडल रिक्शा, ई-रिक्शा और अन्य जरूरी उपकरणों की मरम्मत व रखरखाव (Maintenance) में किया जा रहा है।
ग्रामीण विकास और सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सहरसा में कचरा प्रबंधन और पर्यावरण सुरक्षा की एक बेहतरीन परंपरा शुरू हुई है। कचरे से खाद, नर्सरी और फिर राजस्व जुटाने का यह चक्र बिहार में स्वच्छता और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बनेगा। उन्होंने कहा कि पौधों की बिक्री से मिलने वाले राजस्व से स्वच्छता से जुड़ी संपत्तियों का रखरखाव करना पंचायतों के उत्कृष्ट और दूरदर्शी प्रबंधन का सबूत है।





