Patna: नर्सिंग शिक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान (SIHFW), पटना में आयोजित पांच दिवसीय रिफ्रेशर प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुक्रवार को समापन हो गया। 24 से 28 अगस्त तक चले प्रशिक्षण के दूसरे बैच में 37 नर्सिंग ट्यूटरों ने हिस्सा लिया। समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र दिए गए। प्रशिक्षण का विषय ‘Advanced Techniques of Newer Educational Methods’ था। इसमें नर्सिंग ट्यूटरों को विद्यार्थियों को पढ़ाने की नई और प्रभावी तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
5 दिन में सिखाई गईं नई शिक्षण पद्धतियां
प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थी-केंद्रित, सहभागी और नवाचार आधारित शिक्षण पद्धतियों पर विशेष जोर दिया गया। प्रतिभागियों को हैंड्स-ऑन लर्निंग, स्टेशन कार्ड, कैरोसेल, कार्ड सॉर्टिंग, डिबेट और केस आधारित गतिविधियों का अभ्यास कराया गया। इन गतिविधियों के जरिए टीम वर्क, क्रिटिकल थिंकिंग, समस्या-समाधान और प्रभावी संचार जैसी क्षमताओं को विकसित करने पर जोर दिया गया।
नर्सिंग शिक्षा की गुणवत्ता मजबूत करने पर जोर
स्वास्थ्य मंत्री श्री निशांत ने कहा कि नर्सिंग शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर बनाने में प्रशिक्षित और दक्ष नर्सिंग ट्यूटरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके मुताबिक नई और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण पद्धतियों से शिक्षकों की क्षमता बढ़ेगी और विद्यार्थियों को सीखने का बेहतर अनुभव मिलेगा। मंत्री ने कहा कि नर्सिंग शिक्षा को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए विभाग लगातार काम कर रहा है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम ट्यूटरों को नई तकनीकों से जोड़ने के साथ उन्हें अधिक आत्मविश्वासी और नवाचार के लिए तैयार करने में मदद करेंगे।
37 प्रतिभागियों को मिले प्रमाण-पत्र
प्रशिक्षण में सफलतापूर्वक भाग लेने वाले सभी 37 प्रतिभागियों को समापन समारोह में प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। प्रमाण-पत्र प्रशिक्षण प्रभारी वृंदा लाल, निदेशक डॉ. पूनम रमन और राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. बी.के. मिश्रा ने प्रदान किए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि नर्सिंग शिक्षा में नई और प्रभावी शिक्षण विधियों को शामिल करने से विद्यार्थियों के सीखने का अनुभव बेहतर होने के साथ शिक्षकों की शिक्षण क्षमता भी मजबूत होगी।
संस्थानों में नई तकनीकों के इस्तेमाल पर रहेगा फोकस
प्रशिक्षण के बाद सीखी गई नई शिक्षण विधियों को संबंधित संस्थानों में प्रभावी तरीके से लागू करने पर भी काम किया जाएगा। इसके साथ ही इनके प्रभाव की समीक्षा और फॉलो-अप की व्यवस्था भी की जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशिक्षण में सीखी गई तकनीकों का असर कक्षा-कक्ष और क्लिनिकल शिक्षण में भी दिखाई दे।




