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थाना प्रभारियों की मनमानी पर कानूनी चाबुक, पुलिस मैनुअल से लेकर सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश

वर्दी का रोब या कानून का राज? विधायक जयराम महतो विवाद के बीच जानिए आम जनता के अधिकार और पुलिस की जवाबदेही

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रांची: झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हाल ही में डुमरी विधायक जयराम महतो और स्थानीय थाना प्रभारी के बीच हुआ तीखा विवाद चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस घटना ने एक बार फिर राज्य में पुलिसिया रवैये, आम जनता के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और थाना प्रभारियों की मनमानी की पुरानी बहस को ताजा कर दिया है। जब जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने या जनता की शिकायतें दर्ज कराने के लिए पुलिस पदाधिकारियों के कड़े रुख का सामना करना पड़ता है, तो यह सहज ही सवाल उठाता है कि आम नागरिक, जो बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के थाने की चौखट पर पहुंचता है, उसकी सुनवाई किस प्रकार होती होगी?

अक्सर देखने में आता है कि थानों में शिकायत लेकर पहुंचने वाले आम लोगों के साथ अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज और शिकायत दर्ज करने में टालमटोल की शिकायतें आम हैं। लोकतंत्र में पुलिस बल का प्राथमिक उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था को मजबूत करना है, न कि भय और दबाव का माहौल निर्मित करना। इस विशेष रिपोर्ट में हम झारखंड पुलिस मैनुअल, कानूनी धाराओं और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों के आलोक में यह विश्लेषण करेंगे कि पुलिसिया दुर्व्यवहार के खिलाफ नागरिकों के पास क्या कानूनी अधिकार और उपचार उपलब्ध हैं।

झारखंड पुलिस मैनुअल और अनुशासन के कड़े प्रावधान

झारखंड राज्य में पुलिस बल का संचालन और अनुशासन मुख्य रूप से झारखंड पुलिस मैनुअल (जो पूर्ववर्ती बिहार पुलिस मैनुअल पर आधारित है) द्वारा नियंत्रित होता है। मैनुअल के नियम 824 और इसके बाद की धाराओं में पुलिस पदाधिकारियों के आचरण, कर्तव्य निष्ठा और अनुशासनहीनता पर सख्त दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं।

मैनुअल के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी थाने का प्रभारी या पुलिसकर्मी आम जनता के साथ असंसदीय भाषा, दुर्व्यवहार या मारपीट नहीं कर सकता। पुलिस अधिनियम 1861 की धारा 29 के तहत, यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने कर्तव्य में घोर लापरवाही बरतता है, अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है, या जनता के साथ दुर्व्यवहार में लिप्त पाया जाता है, तो यह एक दंडनीय अपराध है, जिसके तहत निलंबन, विभागीय जांच और कारावास तक का प्रावधान है।

  • जनता से व्यवहार: थानों में आने वाले प्रत्येक पीड़ित के साथ सौहार्दपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अनिवार्य है।

  • अनिवार्य एफआईआर: संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना मिलने पर तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना बाध्यकारी है।

  • दंडात्मक कार्रवाई: दुर्व्यवहार, रिश्वतखोरी, या अवैध हिरासत में रखे जाने पर सख्त विभागीय कार्रवाई और वेतन रोकने का प्रावधान है।

थाना प्रभारियों की मनमानी पर क्या कहता है कानून?

अक्सर देखा जाता है कि थानेदार किसी मामले में तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज करने से मना कर देते हैं या शिकायतकर्ता को डरा-धमका कर भगा देते हैं। ऐसा करना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) के ऐतिहासिक मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि यदि किसी शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो पुलिस अधिकारी के लिए प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना अनिवार्य (Mandatory) है। एफआईआर दर्ज न करना या उसमें देरी करना सीधे तौर पर अदालत के आदेशों की अवहेलना मानी जाएगी और संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ अवमानना और विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय: पुलिस शक्तियों की सीमाएं

सर्वोच्च न्यायालय ने कई मौकों पर पुलिस द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग, कस्टोडियल वायलेंस और दुर्व्यवहार पर कड़ा रुख अपनाया है:

  1. डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और पूछताछ को लेकर 11 अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए थे। अदालत ने कहा था कि किसी भी नागरिक का मानवीय सम्मान उसका मौलिक अधिकार है, जिसे गिरफ्तारी के दौरान भी छीना नहीं जा सकता। पुलिसकर्मी अपनी वर्दी के रोब में गाली-गलौज या हिंसा नहीं कर सकते।

  2. अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014): इस मामले में अदालत ने माना कि पुलिस अधिकारी अक्सर अपनी गिरफ्तारी की शक्तियों का इस्तेमाल प्रताड़ना के साधन के रूप में करते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि 7 साल तक की सजा वाले मामलों में अनावश्यक गिरफ्तारी न की जाए और धारा 41A CrPC (अब BNSS की धारा 35) के नोटिस का पालन किया जाए।

राज्य और जिला पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण (Police Accountability Authority)

सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार (2006) मामले में दिए गए निर्देशों के आलोक में झारखंड में पुलिस की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए राज्य और जिला पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण की स्थापना की गई है। यदि कोई थाना प्रभारी या पुलिसकर्मी निम्नलिखित कृत्य करता है, तो नागरिक इस प्राधिकरण में सीधी शिकायत दर्ज करा सकते हैं:

  • हिरासत में मौत या गंभीर चोट पहुंचाना।

  • अवैध रूप से हिरासत में रखना।

  • जबरन वसूली (Extortion) या रिश्वत की मांग।

  • आम नागरिकों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार और शक्तियों का दुरुपयोग।

जिला स्तर पर जिला पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण और राज्य स्तर पर राज्य पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिस पदाधिकारियों के खिलाफ निलंबन, वेतन वृद्धि रोकने, या आपराधिक मुकदमा चलाने की सिफारिश करता है।

यदि थाना प्रभारी दुर्व्यवहार करे या केस दर्ज न करे तो क्या करें? (शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया)

यदि कोई आम नागरिक पुलिस की मनमानी का शिकार होता है, तो उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय कानून प्रणाली में इसके खिलाफ स्पष्ट और प्रभावी कदम उपलब्ध हैं:

  1. उच्च पुलिस अधिकारियों को लिखित शिकायत:

    यदि थाना प्रभारी आपकी शिकायत नहीं सुनता या आपके साथ दुर्व्यवहार करता है, तो आप भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) [पूर्ववर्ती CrPC 154(3)] के तहत संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस अधीक्षक (SP) को पंजीकृत डाक अथवा व्यक्तिगत रूप से शिकायत भेज सकते हैं।

  2. न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत (कोर्ट केस / परिवाद):

    यदि SP कार्यालय से भी सुनवाई न हो, तो नागरिक BNSS की धारा 175(4) / 223 [पूर्ववर्ती CrPC 156(3) / 200] के तहत क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ‘परिवाद’ (Complaint Petition) दाखिल कर सकते हैं। अदालत के पास पुलिस को तुरंत मामला दर्ज कर जांच करने या स्वयं संज्ञान लेने की पूर्ण शक्ति है।

  3. मानवाधिकार आयोग (NHRC / SHRC):

    पुलिस द्वारा गाली-गलौज, मारपीट या मानवाधिकारों का हनन किए जाने की स्थिति में नागरिक राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

सजग नागरिक ही मजबूत लोकतंत्र का आधार

विधायक जयराम महतो और थाना प्रभारी के बीच का विवाद यह स्पष्ट रेखांकित करता है कि जब तक प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक कानून के शासन की अवधारणा अधूरी रहेगी। कानून ने पुलिस को असीमित अधिकार नहीं दिए हैं, बल्कि उनकी शक्तियों को कर्तव्य और सेवा से बांधा है। आम नागरिकों को अपने अधिकारों, झारखंड पुलिस मैनुअल के नियमों और न्यायिक व्यवस्था के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है ताकि पुलिसिया मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके।

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