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अमेरिका की ऐशो-आराम छोड़ झारखंडी अस्मिता-कला को दिलाई वैश्विक मंच पर नई पहचान

मांदर की थाप और आदिवासी स्वाभिमान के अमर प्रतीक: डॉ. रामदयाल मुंडा

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रांची: झारखंड की पावन धरा ने इतिहास के हर दौर में ऐसे नायकों को जन्म दिया है, जिन्होंने न केवल अपनी माटी का मान बढ़ाया, बल्कि दबे-कुचले और वंचित समाज की आवाज बनकर दुनिया के नक्शे पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। इन्हीं महान विभूतियों में एक अग्रणी नाम है- पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा। 23 अगस्त 1939 को रांची जिले के तमाड़ प्रखंड स्थित सुदूर दिउड़ी गांव में जन्मे डॉ. मुंडा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक संपूर्ण सांस्कृतिक एवं बौद्धिक आंदोलन थे।
आज जब देश और दुनिया उनकी 87वीं जयंती मनाने जा रही है, तो उनके जीवन की वह अमर पंक्तियां स्वतः ही कानों में गूंजने लगती हैं-“सेन से सुसुन, काजिगे दुरंग, दुरीगे दुमंग” यानी आदिवासियों का चलना ही नृत्य है, बोलना ही संगीत है और नितंब ही मांदर है। उन्होंने अपने जीवन में ‘जे नाची से बांची’ (जो नाचेगा, वही बचेगा) के मूलमंत्र को चरितार्थ करते हुए अपनी लोक संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने का संदेश पूरी दुनिया को दिया।

अमेरिका के ऐशो-आराम को ठुकराकर माटी की सेवा में वापसी

डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन संघर्ष, उच्च शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अद्भुत मिसाल रहा है। अमेरिका के प्रतिष्ठित मिनेसोटा विश्वविद्यालय में अध्यापन का आकर्षक पेशा और सुख-सुविधाएं उनके कदम नहीं बांध सकीं। 1980 के दशक में जब अलग झारखंड राज्य का आंदोलन अत्यंत उग्र दौर से गुजर रहा था, तब उन्होंने विदेश की सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपनी मातृभूमि लौटने का साहसिक निर्णय लिया।
वे जानते थे कि राजनीतिक संघर्ष तब तक अधूरा है, जब तक उसे एक मजबूत बौद्धिक और सांस्कृतिक धरातल न मिले। रांची लौटकर उन्होंने डॉ. कुमार सुरेश सिंह और डॉ. बी.पी. केशरी जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर रांची विश्वविद्यालय में ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग’ (TRL) की नींव रखी। इस विभाग के माध्यम से नागपुरी, मुंडारी, संथाली, कुड़ुख, हो और पंचपरगनिया जैसी उपेक्षित भाषाओं को पहली बार अकादमिक पहचान मिली।

‘पाइका नाच’ को सोवियत रूस से लेकर यूएनओ तक पहुंचाया

डॉ. रामदयाल मुंडा केवल भाषाविद या साहित्यकार ही नहीं थे, वे एक अप्रतिम लोक कलाकार और बांसुरी वादक भी थे। 1987 में जब सोवियत संघ (रूस) में ‘भारत महोत्सव’ का आयोजन हुआ, तो डॉ. मुंडा के नेतृत्व में झारखंडी सांस्कृतिक दल ने वहां अपने पारंपरिक ‘पाइका नृत्य’ का ऐसा समां बांधा कि विदेशी दर्शक भी थिरकने पर मजबूर हो गए।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के जिनेवा स्थित मंच से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक भारतीय आदिवासियों के मानवाधिकारों और उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान की वकालत की। विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की परंपरा की शुरुआत में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

रांची विश्वविद्यालय के कुलपति से राज्यसभा सांसद तक का सफर

शिक्षा और समाजशास्त्र के क्षेत्र में असाधारण योगदान के कारण उन्हें वर्ष 1986 से 1988 के दौरान रांची विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। बाद में वे भारत सरकार द्वारा गठित ‘कमेटी ऑन झारखंड मैटर’ के प्रमुख सदस्य बने, जिसने पृथक झारखंड राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
उनकी बहुमुखी प्रतिभा और समाज सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2007 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2010 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा। उसी वर्ष उन्हें राज्यसभा का सांसद भी मनोनीत किया गया।

साहित्य और सर्वसमावेशी विचार की अमर विरासत

नागपुरी, मुंडारी, हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार रखने वाले डॉ. मुंडा ने 10 से अधिक पुस्तकें और दर्जनों शोध पत्र रचे। उनकी रचित पुस्तक ‘आदि धरम’ और प्रसिद्ध ‘सरहुल मंत्र’ उनके सर्वसमावेशी विचार का अनुपम उदाहरण हैं। सरहुल मंत्र में वे परमेश्वर और धरती मां के साथ-साथ शेक्सपियर, टैगोर, मार्क्स, गांधी, नेहरू, बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू को एक साथ पंक्ति में बिठाकर हड़िया का रस और भात खाने का निमंत्रण देते हैं।
30 सितंबर 2011 को कैंसर से लड़ते हुए यह महान विभूति भले ही भौतिक रूप से हमसे विदा हो गई, लेकिन उनकी बांसुरी की धुन, मांदर की गूंज और उनके बौद्धिक विचार आज भी झारखंड की हर वादी और हर आदिवासी के दिल में जीवित हैं।
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