Ranchi — केंद्र सरकार द्वारा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के वाणिज्यिक लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के प्रस्ताव के बाद व्यापार जगत में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। फेडरेशन ऑफ झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (एफजेसीसीआई) ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। संगठन के अध्यक्ष तुलसी पटेल ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को औपचारिक पत्र लिखकर 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने के निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करने और इसे वापस लेने का आग्रह किया है।
15 अक्टूबर से प्रभावी होना है नया शुल्क ढांचा
प्रस्तावित नियमों के अनुसार, यह नया शुल्क ढांचा 15 अक्टूबर से लागू किया जाना है। इसके अंतर्गत व्यापारिक लेन-देन (P2M) में ₹2,000 से अधिक की राशि पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर वसूला जाएगा, जिसमें ₹75,000 से अधिक के बड़े भुगतानों के लिए अधिकतम कैप ₹300 निर्धारित किया गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि ₹2,000 तक के छोटे भुगतानों और आम नागरिकों के बीच होने वाले व्यक्तिगत लेनदेन (P2P) पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा।
छोटे व्यापारियों और MSME की लागत बढ़ने की आशंका
एफजेसीसीआई अध्यक्ष तुलसी पटेल ने वित्त मंत्री को भेजे अपने पत्र में रेखांकित किया कि शून्य एमडीआर व्यवस्था के कारण ही देश भर के छोटे दुकानदारों, खुदरा व्यापारियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) ने डिजिटल भुगतान को तेजी से अपनाया था। यदि यह नया चार्ज लागू होता है, तो व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की परिचालन लागत (ऑपरेटिंग कॉस्ट) काफी बढ़ जाएगी, जिससे डिजिटल लेनदेन की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है।
‘कम मार्जिन वाले कारोबारियों पर दोहरा असर’
चैंबर ने तर्क दिया कि पहली नजर में 0.4 प्रतिशत का शुल्क भले ही मामूली प्रतीत हो, लेकिन जो व्यापारी रोजाना बड़ी संख्या में डिजिटल ट्रांजैक्शन करते हैं, उनके लिए यह संचयी लागत काफी अधिक हो जाती है। खुदरा और थोक व्यापारी पहले से ही बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा और नाममात्र के लाभ मार्जिन (प्रॉफिट मार्जिन) पर काम कर रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त वित्तीय बोझ उनके मुनाफे को चोट पहुंचाएगा। चैंबर ने डिजिटल इंडिया के मिशन को बनाए रखने के लिए शून्य एमडीआर की मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने की अपील की है।



