Vaishali: परिवार से मिली पारंपरिक मिट्टी और फाइबर की मूर्तियां बनाने की कला को वैशाली की लक्ष्मी दीदी ने जीविका के सहयोग से सफल कारोबार का रूप दिया है। कभी पूंजी की कमी के कारण सीमित स्तर पर चलने वाला यह काम अब स्थानीय बाजार से निकलकर Amazon, Flipkart और Meesho जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच गया है। जीविका से जुड़ने के बाद लक्ष्मी दीदी को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिली, जिससे उन्होंने अपने पारंपरिक काम को विस्तार देने की शुरुआत की। बेहतर डिजाइन, नई तकनीक और ऑनलाइन बाजार से जुड़ाव ने उनके कारोबार का दायरा बढ़ाया है।
50 हजार की मदद से कारोबार को मिली नई रफ्तार
लक्ष्मी दीदी शुरुआत में अपने बेटे के साथ मिलकर मिट्टी की मूर्तियां बनाने का काम करती थीं। परिवार से मिले इस हुनर को कारोबार में बदलने की इच्छा थी, लेकिन पूंजी की कमी बड़ी बाधा थी। जीविका से जुड़ने के बाद उन्हें 50 हजार रुपये की आर्थिक मदद मिली। इसके बाद उन्होंने मूर्ति निर्माण के काम को विस्तार देना शुरू किया। धीरे-धीरे उत्पादों की मांग बढ़ी और कारोबार को स्थानीय बाजार के साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जोड़ने का रास्ता खुला।
Amazon-Flipkart तक पहुंची पारंपरिक कला
आज लक्ष्मी दीदी द्वारा तैयार मिट्टी और फाइबर की मूर्तियां सिर्फ स्थानीय ग्राहकों तक सीमित नहीं हैं। उनके उत्पाद Amazon, Flipkart और Meesho जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों में ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। ऑनलाइन बाजार मिलने से उनके उत्पादों की पहुंच और बिक्री दोनों का दायरा बढ़ा है। इससे परिवार की पारंपरिक कला को भी नई पहचान मिली है।
परिवार का हुनर बना आय का जरिया
लक्ष्मी दीदी बताती हैं कि पूरा परिवार मिलकर मिट्टी की मूर्तियां तैयार करता है और उन्हें बेचता है। उनके मुताबिक जीविका से जुड़ने के बाद कारोबार को आगे बढ़ाने का अवसर मिला और पारंपरिक कला को बाजार उपलब्ध हुआ। उनका कहना है कि पहले यह काम परिवार की परंपरा तक सीमित था, लेकिन जीविका के सहयोग से इसे व्यवस्थित कारोबार के रूप में आगे बढ़ाया जा सका।
बेटे ने संभाला ऑनलाइन कारोबार
लक्ष्मी दीदी के बेटे विक्कू कुमार भी अपनी मां के साथ इस कारोबार में सक्रिय रूप से जुड़े हैं। उन्होंने परिवार की पारंपरिक कला को ऑनलाइन बाजार से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। विक्कू कुमार के मुताबिक, उनके पिता और दादा भी मिट्टी की मूर्तियां बनाने का काम करते थे। अब परिवार मिट्टी के साथ-साथ फाइबर की मूर्तियां भी तैयार करता है। उनके अनुसार रोजाना करीब 10 मूर्तियों के ऑर्डर मिलते हैं। विक्कू ने बताया कि उनके बनाए उत्पाद विदेश भी भेजे जा चुके हैं और अब परिवार इस कारोबार को राष्ट्रीय स्तर पर और विस्तार देना चाहता है।
जीविका से मिला हुनर को बाजार
लक्ष्मी दीदी की कहानी बताती है कि आर्थिक सहयोग और बाजार से जुड़ाव मिलने पर पारंपरिक हुनर को भी आधुनिक कारोबार में बदला जा सकता है। जीविका के सहयोग से उन्हें न सिर्फ अपने काम को विस्तार देने का अवसर मिला, बल्कि परिवार के लिए आय का एक मजबूत जरिया भी तैयार हुआ। उनके कारोबार से बिहार की पारंपरिक कला को नई पहचान मिलने के साथ ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और स्वरोजगार बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत होती हैं।




