Jamshedpur.
बर्मामाइंस के सामाजिक कार्यकर्ता एवं व्यवसायी मो. आफताब आलम की गोली मारकर हत्या ने शहर में कानून-व्यवस्था, नशे के बढ़ते कारोबार और पुलिस की कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल एक हत्या का मामला नहीं रह गई है, बल्कि नशा विरोधी मुहिम, अपराध नियंत्रण और पुलिस की प्रभावशीलता पर व्यापक बहस का विषय बन गई है।

घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1 अगस्त को मो. आफताब पुलिस द्वारा आयोजित नशा जागरूकता रैली में शामिल हुए थे। वहां उन्होंने कथित रूप से युवाओं में बढ़ते नशे के कारोबार पर चिंता जताई और इसे रोकने की अपील की। इसके अगले ही दिन, 2 अगस्त की रात, बर्मामाइंस थाना से लगभग 500 मीटर की दूरी पर उन पर ताबड़तोड़ गोलीबारी हुई। इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
समय का यह क्रम स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न पैदा करता है। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हत्या का सीधा संबंध नशा विरोधी अभियान से था। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। लेकिन यह सवाल जरूर उठाया जा सकता है कि जिस आफताब की कोई दुश्मनी नहीं थी, उसे नशा के खिलाफ अभियान में शामिल होने के दूसरे दिन ही क्यों गोली मारी जाती है? सबसे बड़ी बात है कि घटना को अंजाम देने में जिन आरोपियों का नाम सामने आ रहे हैं उनके ऊपर पूर्व से अपराधिक रिकॉर्ड है और नशा के कारोबार में संलिप्त होने का आरोप है।
पुलिस की कार्रवाई पर उठते सवाल

घटना के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर 11 लोगों को नामजद आरोपी बनाया और कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। समाचार लिखे जाने तक मुख्य आरोपी मो. शाहरुख के आत्मसमर्पण की सूचना सामने आई थी।
फिर भी स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि अधिकांश आरोपी पहले से आपराधिक मामलों में शामिल रहे हैं और पुलिस के रिकॉर्ड में थे, तो उन्हें समय रहते अपराध करने से क्यों नहीं रोका जा सका। यह भी चर्चा का विषय है कि घटना थाना क्षेत्र के बेहद निकट हुई।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी आरोपी का आपराधिक इतिहास होना अपने-आप में हर नए अपराध को रोक पाने की गारंटी नहीं है। पुलिस की भूमिका और उसकी सफलता या विफलता का आकलन जांच पूरी होने और अभियोजन की प्रगति के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
आफताब ही क्यों?
सवाल यह है कि आखिर रैली में अन्य लोग भी शामिल थे, तो हमलावरों ने आफताब को ही क्यों गोली मारी। दरअसल जो बातें सामने आ रही है उसके अनुसार जो जिन आरोपियों का नाम घटना को अंजाम देने में आ रहे हैं उसमें से कुछ मो आफताब के रिश्तेदार है। इसका अर्थ यह है कि आरोपियों को इस बात का डर था कि आफताब उनके खिलाफ भी पुलिस को बोल सकता है. डर और आफताब के खिलाफ आक्रोश के कारण अपराधियों ने आफताब को न केवल शॉफ्ट टारगेट बनाया बल्कि नशा के खिलाफ उठ रहे आवाज को दबाने का सीधा संदेश दिया है, कि जो भी उनके धंधा के आड़े आएगा उसे हटा दिया जाएगा, वह उनका सगा ही क्यों न हो।
ब्राउन शुगर का बढ़ता खतरा
जमशेदपुर और आसपास के क्षेत्रों में ब्राउन शुगर की तस्करी और उसकी उपलब्धता को लेकर लंबे समय से चिंताएं जताई जाती रही हैं। पुलिस समय-समय पर मादक पदार्थों की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी करती रही है। इसके बावजूद यह धारणा बनी हुई है कि सप्लाई नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है और नए लोग लगातार इस अवैध कारोबार से जुड़ते जा रहे हैं।
यदि वास्तव में मादक पदार्थों का संगठित नेटवर्क सक्रिय है, तो केवल छोटे स्तर के विक्रेताओं की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी। जांच एजेंसियों को सप्लाई चेन, वित्तीय स्रोतों और पूरे नेटवर्क की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।
समाज की चिंता और जनाक्रोश
मो. आफताब की मौत के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और लोगों ने आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी तथा उनके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की। कुछ प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर आरोपियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग भी उठाई।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विरोध दर्ज कराना स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी आरोपी के विरुद्ध दंड का निर्धारण न्यायालय और विधिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।
आगे की चुनौती
यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज दोनों के लिए चेतावनी है। यदि नशे के कारोबार को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो आवश्यकता है कि
- मादक पदार्थों के पूरे सप्लाई नेटवर्क की वैज्ञानिक एवं वित्तीय जांच हो।
- अंतरजिला और अंतरराज्यीय समन्वय के साथ कार्रवाई की जाए।
- नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान के साथ-साथ प्रभावी प्रवर्तन भी सुनिश्चित किया जाए।
- ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों की सुरक्षा पर भी विचार किया जाए, जो नशा विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
मो. आफताब हत्याकांड की निष्पक्ष और त्वरित जांच केवल एक हत्या का पर्दाफाश करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि जांच में नशे के अवैध कारोबार या किसी संगठित आपराधिक नेटवर्क की भूमिका सामने आती है, तो उसके पूरे तंत्र पर निर्णायक कार्रवाई आवश्यक होगी।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े, दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिले और इस घटना से जुड़े सभी पहलुओं का पारदर्शी खुलासा किया जाए। तभी जनता का कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर विश्वास और मजबूत हो सकेगा।
इन लोगों पर दर्ज हुआ है केस
बर्मामाइंस पुलिस के इस मामले में कुल 11 लोगों को नामजद आरोपी बनाया है. शहनवाज उर्फ भोंदू, मो रेहान, आयन, मो शाहरुख, मो इमरान, मो समद, रानी परवीन, अंगूरी बेगम, कुलसुम बीवी, बगुली, उदय महतो पर नामजद केस दर्ज हुआ है. अज्ञात को भी आरोपी बनाया गया है. पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों को हिरासत में लिया है और पूछताछ कर रही है. पुलिस ने जल्द इस मामले के आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा किया है.




