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सड़ने लगीं जड़ें, गलने लगे पौधे, अत्यधिक वर्षा और जलभराव से प्रकृति को भारी नुकसान

आफत की बारिश, जब कुदरत का 'अमृत' बनने लगे पौधों और फसलों के लिए 'जहर'

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Ranchi: बारिश का मौसम आमतौर पर पेड़-पौधों और फसलों के लिए नवजीवन और संजीवनी लेकर आता है। सूखी धरती पर जैसे ही मानसून की पहली फुहारें पड़ती हैं, पेड़-पौधे लहलहा उठते हैं और चारों तरफ हरियाली छा जाती है। लेकिन जब यही बारिश अपनी सीमाएं लांघकर मूसलाधार रूप ले लेती है या लगातार कई दिनों तक थमने का नाम नहीं लेती, तो कुदरत का यही वरदान पौधों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। इन दिनों देश के कई हिस्सों में हो रही अत्यधिक वर्षा और उसके कारण जगह-जगह हो रहा जलभराव पेड़-पौधों और खेती-किसानी को अपूरणीय क्षति पहुँचा रहा है।
अत्यधिक बारिश से पेड़-पौधों को होने वाला सबसे गंभीर और पहला नुकसान ‘रूट रॉट’ यानी जड़ों के सड़ने के रूप में सामने आता है। कृषि एवं उद्यानिकी विशेषज्ञों के अनुसार, पौधों की जड़ों को सुचारू रूप से काम करने के लिए मिट्टी में मौजूद नमी के साथ-साथ ऑक्सीजन की भी आवश्यकता होती है। जब गमलों, बागीचों या खेतों में लगातार पानी भरा रहता है, तो मिट्टी के सूक्ष्म छिद्र बंद हो जाते हैं और उसमें ऑक्सीजन का प्रवाह पूरी तरह रुक जाता है। हवा न मिलने और लगातार दलदल जैसी नमी बने रहने से जड़ें सड़ने लगती हैं। जब जड़ें ही नष्ट हो जाती हैं, तो पौधा पानी और पोषक तत्व सोखना बंद कर देता है, जिससे उसकी पत्तियाँ पीली पड़कर गिरने लगती हैं और अंततः पूरा पौधा सूख जाता है।
बारिश का दूसरा सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मिट्टी के पोषक तत्वों का बह जाना है। तेज बारिश के बहाव के साथ मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत (टॉपसॉइल) बह जाती है। इसके साथ ही पौधों की वृद्धि के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस भी पानी में घुलकर बह जाते हैं। नतीजतन, अत्यधिक पानी मिलने के बावजूद पौधा कुपोषण का शिकार हो जाता है और उसकी शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
इसके अलावा, अत्यधिक नमी और लगातार बने रहने वाले गीले माहौल में कवक (फंगस) और विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं (बैक्टीरिया) का प्रकोप बहुत तेज़ी से फैलता है। पौधों के तनों और पत्तियों पर काले, भूरे या सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। डैम्पिंग-ऑफ और फंगल इंफेक्शन की वजह से छोटे व नए पौधे या तो तने के पास से गलकर गिर जाते हैं या सड़ जाते हैं। सब्जियों और फूलों के पौधों में यह समस्या सबसे ज़्यादा देखी जाती है, जहां गोभी, मिर्च, टमाटर और लतरदार सब्जियों के पौधे जलजमाव के कारण रातों-रात खराब हो जाते हैं।
तेज हवाओं के साथ होने वाली मूसलाधार बारिश का एक और खतरनाक पहलू ‘लॉजिंग’ यानी पौधों का टूटकर गिरना है। जब मूसलाधार बारिश से मिट्टी एकदम नरम और ढीली हो जाती है, तो तेज हवाओं के थपेड़े सहना पौधों के लिए असंभव हो जाता है। बड़े-बड़े छायादार पेड़ जड़ों समेत उखड़ जाते हैं, वहीं खेतों में तैयार खड़ी धान, बाजरा और केले की फसलें जमीन पर बिछ जाती हैं। एक बार फसलें या पौधे जमीन पर गिर जाएं, तो उनका फल-फूल पकना बंद हो जाता है और वे पानी में सड़ने लगते हैं।
गमलों और घरेलू बगीचों में रखे पौधों के लिए भी जलभराव भारी मुसीबत बन रहा है। गमलों के नीचे लगी प्लेटों या गमलों के निकास छिद्रों के बंद होने से उनमें रुका हुआ पानी न केवल जड़ों को सड़ाता है, बल्कि उसमें डेंगू और मलेरिया फैलाने वाले एडिज मच्छर भी पनपने लगते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह है कि मानसून के दौरान पौधों और फसलों को बचाने के लिए जल निकासी (ड्रेनेज) का पुख्ता इंतजाम किया जाए। गमलों के ड्रेनेज होल को खुला रखें, खेतों में अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने के लिए नालियां बनाएं और जलजमाव की स्थिति में रासायनिक उर्वरकों के बजाय बारिश थमने पर केवल फफूंदनाशक (फंगीसाइड) या नीम के तेल का छिड़काव करें। कुदरत के इस अनियंत्रित मिजाज से पेड़-पौधों को बचाने के लिए थोड़ी सी सतर्कता और सही देखभाल ही एकमात्र बचाव है।
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