New Delhi: बादल फटना (Cloudburst) मानसून के दौरान अक्सर सुनाई देने वाला शब्द है, खासकर पहाड़ी राज्यों में। हालांकि नाम से ऐसा लगता है कि बादल वास्तव में फट जाता है, लेकिन मौसम विज्ञान में इसका अर्थ अलग है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, यदि 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के सीमित क्षेत्र में एक घंटे या उससे कम समय में 100 मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हो जाए, तो उसे बादल फटना कहा जाता है।
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बादल फटना कैसे होता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, जब वातावरण में मौजूद नमी किसी एक स्थान पर अत्यधिक मात्रा में जमा हो जाती है, तब ऐसी स्थिति बनती है। पहाड़ी क्षेत्रों में ऊंचे पर्वत नमीयुक्त हवाओं के रास्ते में अवरोध बनते हैं। इसके कारण हवाएं तेजी से ऊपर उठती हैं और तापमान कम होने पर जलवाष्प तेजी से संघनित होकर बादलों में बदल जाती है। जब बादलों में पानी की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है, तो कम समय में अत्यधिक वर्षा होती है, जिसे क्लाउडबर्स्ट कहा जाता है।
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पहाड़ी क्षेत्रों में क्यों होती हैं ज्यादा घटनाएं?
विशेषज्ञ बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर और हिमालयी क्षेत्र क्लाउडबर्स्ट के लिहाज से अधिक संवेदनशील हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमीयुक्त हवाएं हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराकर ऊपर उठती हैं। संकरी घाटियां और ऊंची चोटियां बादलों को सीमित क्षेत्र में रोक देती हैं, जिससे कम जगह में अधिक नमी जमा हो जाती है और बादल फटने जैसी स्थिति बनती है।
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इसी वजह से डोडा, किश्तवाड़, रामबन, पुंछ, राजौरी, सोनमर्ग और कश्मीर घाटी के ऊंचाई वाले इलाकों में ऐसी घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती हैं।
बादल फटने के दौरान क्या सावधानी बरतें?
विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउडबर्स्ट की आशंका या भारी बारिश के दौरान नदी-नालों, पहाड़ी ढलानों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहना चाहिए। साथ ही मौसम विभाग द्वारा जारी चेतावनियों का पालन करना जरूरी है, ताकि जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
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