Kolkota: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाए जाने के बाद दोबारा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया बेहद धीमी गति से चल रही है। निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि मौजूदा कार्यशैली और सीमित संसाधनों के चलते राज्य में लंबित 37 लाख से अधिक अपीलों का निपटारा करने में लगभग 12 साल (146 महीने) का समय लग जाएगा। तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद डेरेक ओ ब्रायन द्वारा दायर याचिका के जवाब में आयोग ने यह हलफनामा पेश किया है।
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5 महीने में केवल सवा लाख मामलों का निपटारा
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 16 सितंबर तक कुल 37,05,235 अपीलें लंबित थीं। पिछले पांच महीनों के दौरान महज 1 लाख 26 हजार मामलों का ही निस्तारण हो सका है। छुट्टियों को छोड़कर प्रति माह औसतन लगभग 25,238 मामलों का निपटारा हो रहा है। आयोग ने कहा कि अगर ट्राइब्यूनल सातों दिन बिना किसी अवकाश के भी काम करे, तब भी इन सभी मामलों को निपटाने में 146 महीने से अधिक का समय लगेगा। मौजूदा ढांचा और कर्मचारियों की संख्या इतनी बड़ी तादाद में मामलों को संभालने के लिए नाकाफी है।
ट्राइब्यूनल बढ़ाने की मांग और कांग्रेस का तीखा हमला
आयोग ने प्रक्रिया को गति देने के लिए ट्राइब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 करने और न्यायिक अधिकारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देने का सुझाव दिया है। इस बीच, इस पूरे अभियान पर भारी सियासी बवाल शुरू हो गया है। कांग्रेस ने एसआईआर की तीखी आलोचना करते हुए इसे ‘शाह इंस्टीगेटेड रिमूवल’ करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाना संविधान पर सीधा हमला है और इसमें समाज के सबसे गरीब, कमजोर व वंचित वर्गों के मतदाताओं को जानबूझकर निशाना बनाया गया है।
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