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कोरोना बीमा दावा खारिज करने पर बजाज एलियांज को 7.10 लाख रुपये भुगतान का आदेश

चाईबासा कंज्यूमर फोरम की बीमा कंपनी को फटकार, सिर्फ संदेह के आधार पर क्लेम खारिज करना गलत, मरीज को 6 लाख का क्लेम और मुआवजा

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पश्चिमी सिंहभूम: कोरोना काल में स्वास्थ्य बीमा क्लेम खारिज करने वाली बीमा कंपनियों के खिलाफ उपभोक्ता अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसला सुनाते हुए बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पीड़िता रंजिता पॉल के पक्ष में 7.10 लाख रुपये चुकाने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने बीमा कंपनी की जांच रिपोर्ट को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि सिर्फ संदेह के आधार पर क्लेम खारिज करना सेवा में बड़ी कमी है।
पूरा मामला चाईबासा के बंधपाड़ा की रहने वाली रंजिता पॉल से जुड़ा है। उन्होंने बजाज एलियांज से हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रखी थी। अप्रैल 2021 में घातक कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के बाद जब उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई, तो परिजनों ने उन्हें 18 अप्रैल को कोलकाता के गुड समैरिटन अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 1 मई तक उनका गहन इलाज चला। इसके बाद 2 से 5 मई तक रेपोस क्लिनिक एंड रिसर्च सेंटर में उनका उपचार हुआ। इलाज, दवाइयों और अस्पताल के अन्य खर्च मिलाकर पीड़िता ने कुल 6,34,530 रुपये खर्च किए थे।
इलाज के बाद जब उन्होंने बीमा क्लेम दाखिल किया, तो बजाज एलियांज ने 12 मई 2022 को इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि अस्पताल ने जांच में सहयोग नहीं किया और बिलों व पर्चियों में कुछ विसंगतियां थीं। बीमा कंपनी की इस मनमानी के खिलाफ पीड़िता ने जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया (सीसी केस संख्या 08/2025)।
मामले की सुनवाई करते हुए आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों ने पाया कि रंजिता पॉल ने अपने इलाज, भुगतान की रसीदों, मेडिकल रिपोर्ट्स और दवाइयों के बिल अदालत के समक्ष पेश किए थे। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी की अपनी कोई आंतरिक जांच रिपोर्ट किसी दावे को फर्जी या अपात्र साबित करने का एकमात्र जरिया नहीं हो सकती। इसके अलावा कंपनी कोई भी ऐसा मेडिकल साक्ष्य या विशेषज्ञ राय प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि पीड़िता का इलाज अनावश्यक या कोरोना से असंबंधित था।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि बीमा कंपनी को किसी विशेष खर्च पर आपत्ति थी, तो उसे केवल उसी मद की राशि काटनी चाहिए थी, न कि पूरे क्लेम को ही खारिज कर देना चाहिए था। बीमा दावों को खारिज करने के लिए नीतिगत शर्तों का ठोस आधार और सबूत होना अनिवार्य है।
आयोग ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को निर्देशित किया कि वह पीड़िता को 6 लाख रुपये बीमा क्लेम राशि, मानसिक प्रताड़ना के एवज में 1 लाख रुपये का मुआवजा और 10 हजार रुपये कानूनी प्रक्रिया खर्च के रूप में कुल 7.10 लाख रुपये का भुगतान करे। अदालत ने 45 दिनों की समय सीमा तय की है। यदि तय सीमा के भीतर राशि का भुगतान नहीं होता है, तो कंपनी को 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से भुगतान करना होगा। मामले में शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणब कुमार दरिपा और श्वेता पुरोहित ने प्रभावी पैरवी की।
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