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सुप्रीम कोर्ट के बाद झारखंड हाई कोर्ट से भी झटका, मेरिट में कम अंक बने रोड़ा

झारखंड हाई कोर्ट से शिक्षक अभ्यर्थी को बड़ा झटका, 14 माह की देरी और मेरिट लिस्ट के फेर में रिव्यू याचिका खारिज

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Ranchi: झारखंड में हाई स्कूल ग्रेजुएट ट्रेंड टीचर (स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक) नियुक्ति परीक्षा-2016 से जुड़ा एक लंबे समय से चला आ रहा विवाद आखिरकार कानूनी रूप से निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य के चर्चित विज्ञापन संख्या 21/2016 के तहत शिक्षक बनने की आस संजोए अभ्यर्थी नागेंद्र नाथ परिहार को झारखंड उच्च न्यायालय से एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। सोमवार को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रार्थी की ओर से दाखिल सिविल रिव्यू याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि इस पुनर्विचार याचिका को दाखिल करने में लगभग 14 महीने की अत्यधिक देरी की गई है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने यह टिप्पणी की कि पूर्व में पारित आदेश पूरी तरह सुविचारित था और उसमें किसी भी प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप या बदलाव का कोई ठोस विधिक आधार नहीं बनता। इसके साथ ही खंडपीठ ने अपने पूर्व के आदेश को यथावत बरकरार रखा।
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पिपरावाल तथा राज्य सरकार की तरफ से अधिवक्ता शहबाज अख्तर ने अदालत में पक्ष रखा। आयोग की दलीलों ने इस पूरे कानूनी दांव-पेंच की वास्तविक स्थिति को अदालत के सामने रखा।
जेएसएससी की ओर से अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐतिहासिक ‘सत्यजीत कुमार बनाम राज्य सरकार’ मामले में 2 अगस्त 2022 को दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही पूरी चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया था। शीर्ष अदालत के फैसले के आलोक में सभी अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी पर राज्यस्तरीय मेरिट सूची (State Merit List) के आधार पर पारदर्शी तरीके से विचार किया गया था। याचिकाकर्ता नागेंद्र नाथ परिहार ने पिछड़ा वर्ग-2 (BC-2) श्रेणी के तहत अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी। हालांकि, जब समग्र राज्यस्तरीय मेधा सूची तैयार की गई, तो यह पाया गया कि बीसी-1 और बीसी-2 दोनों ही आरक्षित श्रेणियों में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों के प्राप्तांक याचिकाकर्ता से अधिक थे। कट-ऑफ और मेरिट में स्थान न बना पाने के कारण उनका चयन संभव नहीं हो सका।
आयोग की इस स्पष्ट और अकाट्य दलील को आधार मानते हुए उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने पहले ही नागेंद्र नाथ की रिट याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने एकल पीठ के फैसले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय की खंडपीठ में लेटर पेटेंट अपील (एलपीए) दाखिल की, लेकिन खंडपीठ ने भी एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए अपील रद्द कर दी।
राहत की तलाश में प्रार्थी ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख किया, परंतु शीर्ष अदालत से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। तमाम विधिक रास्ते बंद होने के बाद उन्होंने एक बार फिर झारखंड हाई कोर्ट में सिविल रिव्यू याचिका दाखिल की थी। अब मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा 14 महीने की देरी और मेरिट के आधार पर याचिका खारिज किए जाने से प्रार्थी की नियुक्ति की उम्मीदें पूरी तरह समाप्त हो गई हैं।
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