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गर्भ रखना है या नहीं, यह महिला का मौलिक अधिकार; एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Indore: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के वैधानिक और प्रजनन अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी महिला को गर्भावस्था जारी रखनी है या उसका समापन कराना है, यह निर्णय

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Indore: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के वैधानिक और प्रजनन अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी महिला को गर्भावस्था जारी रखनी है या उसका समापन कराना है, यह निर्णय लेने का संप्रभु अधिकार पूरी तरह से उसी महिला का है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत तय कानूनी अवधि के भीतर गर्भपात कराने के लिए पति की लिखित या मौखिक सहमति होना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है। इसी विधिक आधार पर माननीय न्यायालय ने 13 सप्ताह की एक गर्भवती विवाहित महिला को गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी।

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वैवाहिक विवाद और अलगाव के बीच महिला पहुंची थी कोर्ट

यह महत्वपूर्ण आदेश इंदौर संभाग के एक विवाहित जोड़े से जुड़े मामले में पारित किया गया। याचिकाकर्ता महिला का विवाह करीब दो वर्ष पूर्व हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच आपसी मतभेद इस कदर बढ़े कि वे एक-दूसरे से अलग रहने लगे। इसी अलगाव के दौरान महिला के गर्भवती होने की बात सामने आई। महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दलील दी कि जब वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूटने की कगार पर हैं, तो ऐसी स्थिति में बच्चे को जन्म देना उसके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत कठिन होगा। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पति को नोटिस भेजा था, लेकिन वह अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।

अनुच्छेद-21 के तहत शारीरिक स्वायत्तता महिला का अधिकार

सुनवाई के बाद खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने की पूरी आजादी है। यह अधिकार उसकी व्यक्तिगत गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट ने माना कि किसी भी अवांछित गर्भावस्था का सबसे गहरा और सीधा असर महिला के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, इसलिए उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने चिकित्सकों को स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पूरी गोपनीयता और सुरक्षा के साथ गर्भपात की प्रक्रिया संपन्न करने के निर्देश दिए हैं।

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