New Delhi: बीमा पॉलिसी लेने के बाद यदि किसी व्यक्ति की असामयिक मृत्यु हो जाए, तो मिलने वाली बीमा राशि उसके परिवार के लिए एक बड़ा आर्थिक संबल साबित होती है। लेकिन तब क्या हो जब बीमा कंपनी किसी पुरानी बीमारी की जानकारी छिपाने का आधार बनाकर क्लेम के भुगतान से साफ इनकार कर दे? ऐसे में पीड़ित परिवार के सामने मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है।
मध्य प्रदेश से ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां एक महिला को अपने पति की जीवन बीमा पॉलिसियों का हक पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। आखिरकार, राज्य उपभोक्ता आयोग ने महिला के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की अपील को खारिज कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा मामला मध्य प्रदेश की रहने वाली आशा देवी शीतलानी से जुड़ा हुआ है। उनके पति हसनंद ने चौदह मार्च दो हजार छह और इक्कीस अक्टूबर दो हजार आठ को क्रमशः एक लाख और दो लाख रुपये की दो जीवन बीमा पॉलिसियां खरीदी थीं। समय पर प्रीमियम जमा न होने के कारण ये दोनों पॉलिसियां लैप्स (बंद) हो गई थीं, जिन्हें बाद में चौदह दिसंबर दो हजार दस को दोबारा चालू कराया गया था। दुर्भाग्यवश, मार्च दो हजार बारह में हसनंद का निधन हो गया।
पति के निधन के बाद जब उनकी पत्नी आशा देवी ने दोनों पॉलिसियों के तहत मिलने वाली बीमा राशि (क्लेम) के लिए आवेदन किया, तो LIC ने सोलह जनवरी दो हजार चौदह को उनका दावा यह कहकर खारिज कर दिया कि पॉलिसी दोबारा शुरू कराते समय हसनंद ने अपनी मेडिकल हिस्ट्री छुपाई थी।
LIC का आरोप था कि उन्हें टाइप-2 डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या थी, जिसका जिक्र हेल्थ डिक्लेरेशन फॉर्म में नहीं किया गया था। इसके समर्थन में कंपनी ने एक डॉक्टर के मेडिकल सर्टिफिकेट का हवाला भी दिया था, जिसका आशा देवी ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि उनके पति का उस डॉक्टर से कभी कोई इलाज नहीं हुआ था।
दस्तावेजों में गंभीर गड़बड़ियां और आयोग का फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने पाया कि LIC यह साबित करने के लिए कोई भी ठोस और पर्याप्त मेडिकल सबूत पेश नहीं कर सकी कि बीमाधारक ने जानबूझकर कोई बीमारी छुपाई थी। इसके विपरीत, दस्तावेजों में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। बीमा लोकपाल की जांच में यह बात उजागर हुई कि पॉलिसी दिसंबर 2010 में दोबारा शुरू हुई थी, जबकि संबंधित हेल्थ डिक्लेरेशन फॉर्म पर दिसंबर 2012 की तारीख दर्ज थी…जबकि नीतिधारक हसनंद की मृत्यु मार्च 2012 में ही हो चुकी थी। कागजी विसंगतियों के इस खेल ने LIC के दावों की पोल खोल दी।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने LIC की अपील को खारिज करते हुए जिला आयोग के पूर्व फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा। जिला आयोग ने LIC को निर्देश दिया था कि वह दोनों पॉलिसियों के तहत कुल तीन लाख रुपये की बीमा राशि, उस पर लागू बोनस तथा सोलह जनवरी दो हजार चौडाह से लेकर भुगतान की तिथि तक सात प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज का भुगतान करे।
इसके अलावा, मानसिक प्रताड़ना के लिए पांच हजार रुपये मुआवजा और मुकदमे के खर्च के रूप में पंद्रह सौ रुपये देने का भी आदेश दिया गया था। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि बीमा कंपनियां केवल मौखिक या कमजोर आधार पर बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर ग्राहकों का क्लेम नहीं रोक सकतीं; इसके लिए उन्हें पुख्ता और विश्वसनीय दस्तावेज पेश करने ही होंगे।







