Ranchi: राजधानी की सड़कों पर आए दिन महिलाओं के गले से चेन झपट ली जाती है, तेज रफ्तार गाड़ियां बेकसूर राहगीरों को कुचलकर पलक झपकते ही हवा हो जाती हैं और पुलिस लकीर पीटती रह जाती है। वजह? कानून के पास वो ‘तीसरी आंख’ ही नहीं है, जो अपराधियों के चेहरे बेनकाब कर सके। हैरान करने वाली बात यह है कि यह आंख न केवल सड़कों और चौराहों से गायब है, बल्कि खुद उन पुलिस थानों से भी नदारद है, जहां इंसाफ की गुहार लेकर आम नागरिक पहुंचते हैं। झारखंड उच्च न्यायालय में दायर एक मामले की सुनवाई के दौरान जब सरकार ने अपना शपथ पत्र रखा, तो सिस्टम की संवेदनहीनता और पुलिसिया तंत्र की पोल खुलकर सामने आ गई।
हाई कोर्ट सख्त: 32 थानों में कैमरे तक नहीं, कब सुधरेगा सिस्टम?
झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने थानों और प्रमुख चौराहों पर सीसीटीवी कैमरों की बदहाली पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि शहर में अपराध नियंत्रण के लिए सड़कों, चौराहों और थानों में सीसीटीवी कैमरों का 24 घंटे क्रियाशील रहना अनिवार्य है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया कि कैमरों के अभाव में चेन छिनतई और ‘हिट एंड रन’ जैसी गंभीर वारदातों के आरोपी आसानी से फरार हो जाते हैं। पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकाम साबित होती है। कोर्ट ने गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से सख्त लहजे में पूछा है कि आखिर वे समय-सीमा तय कर बताएं कि शेष 32 थानों में कब तक कैमरे लगाए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
सरकारी हलफनामे ने खोली हकीकत, वीआईपी इलाकों के थाने भी अंधेरे में
सरकार द्वारा कोर्ट में पेश किए गए हलफनामे ने यह उजागर कर दिया कि राज्य की राजधानी किस कदर सुरक्षा के नाम पर खिलवाड़ झेल रही है। शपथ पत्र के मुताबिक:
- रांची शहर के 8 प्रमुख थाने और ग्रामीण इलाकों के 24 थाने आज भी सीसीटीवी कैमरों से पूरी तरह वंचित हैं।
- जिन शहरी थानों में एक भी कैमरा नहीं लगा है, उनमें हिंदपीढ़ी, बरियातू, धुर्वा, एयरपोर्ट, पंडरा ओपी, विधानसभा एएचटीयू और साइबर पुलिस स्टेशन शामिल हैं।
- विधानसभा और एयरपोर्ट जैसे अति-संवेदनशील और वीआईपी इलाकों के थानों का कैमरे से महरूम होना यह साबित करता है कि सुरक्षा के दावे कागजी हैं।
- वर्तमान में पूरे शहर के मात्र 17 पुलिस स्टेशनों व ओपी में कुल मिलाकर केवल 123 कैमरे चालू हालत में हैं, जो लाखों की आबादी वाले महानगर के लिए ऊंट के मुंह में जीरा समान हैं।
- अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि राज्य में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए जारी किए गए टेंडर की कछुआ चाल कब खत्म होगी? साथ ही, राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) पर निगरानी के लिए एनएचएआई से भी जवाब-तलब किया गया है।
पुलिस थानों में सीसीटीवी न होना, खाकी की मनमानी और जवाबदेही का अभाव
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक ‘परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह’ मामले में देश के सभी थानों में ऑडियो-वीडियो युक्त सीसीटीवी अनिवार्य करने का आदेश दिया था। बावजूद इसके, रांची के 32 थानों में कैमरे न होना कई गंभीर खतरों को जन्म देता है:
- हिरासत में यातना (कस्टोडियल टॉर्चर) और अवैध हिरासतकैमरे न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि थाने ‘अदृश्य कोठरी’ बन जाते हैं। किसी भी संदेही को बिना औपचारिक गिरफ्तारी या प्राथमिकी के कई-कई दिनों तक गैर-कानूनी ढंग से बैठाए रखने और थर्ड-डिग्री टॉर्चर देने की गुंजाइश बनी रहती है। कस्टोडियल डेथ की स्थिति में पुलिस आसानी से कहानी गढ़ लेती है क्योंकि कोई डिजिटल साक्ष्य नहीं होता।
- झूठे मुकदमों में फंसाने का खेलकैमरे की गैर-मौजूदगी में भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के लिए किसी भी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ फर्जी रिकवरी दिखाना या उसे झूठे आरोप में जेल भेजना आसान हो जाता है।
- अभद्र व्यवहार और भ्रष्टाचार की खुली छूटजब थाने के रिसेप्शन, लॉक-अप और कॉरिडोर में कोई निगरानी नहीं होती, तो फरियादियों के साथ बदसलूकी, गाली-गलौज और एफआईआर दर्ज करने के नाम पर रिश्वतखोरी के आरोप लगातार सामने आते हैं, जिसे साबित करना आम आदमी के लिए नामुमकिन होता है।
- ईमानदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठे आरोपकैमरे न होने का नुकसान केवल जनता को ही नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों को भी है। कई बार शातिर अपराधी या रसूखदार लोग पुलिस पर झूठी मारपीट या दुर्व्यवहार का आरोप लगा देते हैं, जिससे बचने के लिए पुलिस के पास अपनी बेगुनाही का कोई डिजिटल सबूत नहीं बचता।
थानों और सड़कों पर क्रियाशील सीसीटीवी का लाभ
थानों और सड़कों पर 24×7 क्रियाशील कैमरे केवल उपकरण नहीं, बल्कि लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की मजबूत ढाल हैं:
- पारदर्शिता और त्वरित न्याय: थानों में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग चालू रहने से पुलिसकर्मी अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। फरियादी के थाने में कदम रखने से लेकर उसकी शिकायत दर्ज होने तक का हर पल रिकॉर्ड होगा।
- महिलाओं और कमजोर वर्गों को सुरक्षा: जब थानों में सीसीटीवी सक्रिय होंगे, तो पीड़ित महिलाएं, गरीब और लाचार लोग बिना किसी भय के थाने जा सकेंगे। वहां पुलिसकर्मियों का आचरण स्वतः जवाबदेह और संवेदनशील बनेगा।
- अपराधों का तुरंत पर्दाफाश: सड़कों और चौराहों पर उन्नत कैमरों से झपटमारी, लूट, हत्या और सड़क हादसों में भागने वाले अपराधियों को कुछ ही घंटों में ट्रेस किया जा सकेगा। इससे अदालतों में भी ठोस डिजिटल साक्ष्य पेश होंगे, जिससे सजा की दर बढ़ेगी।
- संवैधानिक अधिकारों की रक्षा: संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने और गरिमा का अधिकार) का वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब थाने पारदर्शी हों। फुटेज सुरक्षित रहने से किसी भी प्रताड़ना की स्थिति में नागरिक कोर्ट से फुटेज मांगकर इंसाफ पा सकते हैं।
झारखंड हाई कोर्ट का यह स्पष्ट रुख एक साफ संदेश है कि यदि सुरक्षा तंत्र जनता के अधिकारों के प्रति लापरवाह रहेगा, तो अदालतें मूकदर्शक नहीं बनी रहेंगी। अब गेंद सरकार और पुलिस महकमे के पाले में है कि वे कब तक कागजों से बाहर निकलकर राजधानी को सचमुच सुरक्षित बनाते हैं।

सरकारी हलफनामे ने खोली हकीकत, वीआईपी इलाकों के थाने भी अंधेरे में
पुलिस थानों में सीसीटीवी न होना, खाकी की मनमानी और जवाबदेही का अभाव



