Lifestyle Adda: आज के डिजिटल दौर में बच्चों का अधिकांश समय स्मार्टफोन, टीवी और वीडियो गेम्स के बीच बीत रहा है। स्क्रीन के इस अत्यधिक उपयोग का सीधा असर उनके स्वभाव, व्यवहार और दैनिक आदतों पर पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम हो जाती है कि वे बच्चों को सही समय पर सही मार्गदर्शन दें। किसी भी बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता है और माता-पिता ही उसके पहले शिक्षक होते हैं। अगर कम उम्र से ही बच्चों को अच्छे मैनर्स और संस्कार सिखाए जाएं, तो उनका व्यक्तित्व आत्मनिर्भर और मजबूत बनता है।
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विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को उनकी उम्र और मानसिक समझ के अनुसार ही चीजें सिखानी चाहिए:
1 से 2 साल: नकल और बुनियादी मैनर्स की शुरुआत
इस उम्र में बच्चे बोलना और समझना शुरू करते हैं। वे शब्दों से ज्यादा अपने आसपास के लोगों को देखकर और उनकी नकल करके सीखते हैं।
सिखाने का सही तरीका: बच्चों से हमेशा शांत और प्यार भरे लहजे में बात करें ताकि वे भी मधुरता से बोलना सीखें।
खिलौनों, इशारों और एक्टिंग के जरिए छोटे-छोटे शब्द दोहराएं।
माता-पिता खुद घर में वैसा ही आचरण करें जैसा वे बच्चे से चाहते हैं, क्योंकि इस उम्र में आपका व्यवहार ही उनकी सबसे बड़ी सीख बनता है।
3 से 5 साल: जिद पर नियंत्रण, शेयरिंग और सामाजिक मेलजोल
इस पड़ाव पर बच्चे चीजों को गहराई से समझने लगते हैं, लेकिन साथ ही उनमें अपनी पसंद को लेकर जिद भी बढ़ने लगती है।
सिखाने का सही तरीका: इस नाजुक उम्र में डांटने-फटकारने के बजाय प्यार और धैर्य से काम लें।
बच्चों को अपनी चीजें, खिलौने और खाना दूसरों के साथ साझा (Share) करना सिखाएं।
किसी से मिलते समय ‘Hi/Hello’ या ‘नमस्ते’ और जाते समय ‘Bye’ कहना सिखाएं।
बच्चों के अच्छे व्यवहार पर उनकी खुलकर तारीफ करें और नैतिक कहानियों के जरिए उनमें दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता जगाएं।
6 से 10 साल: सही-गलत की समझ, ईमानदारी और जिम्मेदारी
इस उम्र में बच्चों में तार्किक समझ विकसित होने लगती है और वे सही व गलत का अंतर पहचानने लगते हैं।
सिखाने का सही तरीका: बच्चों में हमेशा सच बोलने की आदत डालें और उन्हें बताएं कि ईमानदारी क्यों जरूरी है।
उन्हें टीमवर्क और मिल-जुलकर रहने की सीख दें ताकि वे सामाजिक रूप से मजबूत बनें।
घर के छोटे-छोटे काम, जैसे स्कूल बैग लगाना या जूते सही जगह रखना, जैसी जिम्मेदारियां सौंपें।
अगर बच्चा कोई गलती करता है, तो सबके सामने गुस्सा करने के बजाय अकेले में शांत स्वर में समझाएं।
स्क्रीन टाइम पर अंकुश और आउटडोर खेल जरूरी
बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उनके मोबाइल और टीवी देखने के समय (स्क्रीन टाइम) की सख्त सीमा तय की जाए। लगातार स्क्रीन के सामने रहने से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित होता है। उन्हें पार्क ले जाएं, आउटडोर खेलों के लिए प्रेरित करें और अन्य शारीरिक गतिविधियों से जोड़ें, ताकि वे स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहें।
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