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डॉ. बीपी केशरी को पुण्यतिथि पर नमन, झारखंड की अस्मिता के लिए रहा जीवन समर्पित

रांची। झारखंड आंदोलन को वैचारिक दिशा देने वाले प्रख्यात शिक्षाविद, साहित्यकार, इतिहासकार और नागपुरी भाषा के विद्वान डॉ. बिशेश्वर प्रसाद (बीपी) केशरी की 10वीं पुण्यतिथि पर शुक्रवार को उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े लोगों ने उनके चित्र

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रांची। झारखंड आंदोलन को वैचारिक दिशा देने वाले प्रख्यात शिक्षाविद, साहित्यकार, इतिहासकार और नागपुरी भाषा के विद्वान डॉ. बिशेश्वर प्रसाद (बीपी) केशरी की 10वीं पुण्यतिथि पर शुक्रवार को उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े लोगों ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि डॉ. केशरी ने झारखंड की भाषा, संस्कृति, इतिहास और अस्मिता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनका निधन 14 अगस्त 2016 को 83 वर्ष की उम्र में हुआ था।

नागपुरी भाषा-साहित्य को दी नयी पहचान

1 जुलाई 1933 को रांची के पिठोरिया में जन्मे डॉ. केशरी ने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से नागपुरी गीतों पर पीएचडी की। इसके बाद नागपुरी भाषा और साहित्य के अध्ययन, शोध और संरक्षण को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने झारखंड की लोक परंपराओं, इतिहास और क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर भी व्यापक लेखन किया।

झारखंड आंदोलन के रहे वैचारिक स्तंभ

डॉ. बीपी केशरी झारखंड आंदोलन के प्रमुख वैचारिक स्तंभों में शामिल रहे। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को भाषा, संस्कृति, इतिहास और क्षेत्रीय पहचान से जोड़कर आंदोलन को वैचारिक मजबूती दी। डॉ. रामदयाल मुंडा समेत कई प्रमुख आंदोलनकारियों के साथ उन्होंने झारखंड आंदोलन को बौद्धिक आधार देने का काम किया। 19 नवंबर 1987 को उनके नेतृत्व में पिठोरिया चौक पर झारखंड राज्य की मांग को लेकर नाकेबंदी भी की गयी थी।

भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर जोर

नागपुरी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए डॉ. केशरी का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने नागपुरी भाषा-साहित्य, छोटानागपुर के इतिहास और झारखंड आंदोलन जैसे विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी रचनाओं में झारखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान, लोक जीवन और स्थानीय भाषाओं के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है।

पिठोरिया में नागपुरी संस्थान की स्थापना कर उन्होंने पुस्तकों, लोक साहित्य और नागपुरी भाषा से जुड़ी सामग्री के संरक्षण की दिशा में भी कार्य किया। उनका मानना था कि किसी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और इतिहास से होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने जीवनभर झारखंडी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए प्रयास किया।

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत

डॉ. बीपी केशरी की 10वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए लोगों ने कहा कि उनका योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं था। उन्होंने झारखंड की अस्मिता और अलग पहचान के लिए वैचारिक संघर्ष किया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करना झारखंड की भाषा, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक चेतना के प्रति उनके समर्पण को याद करना है। उनकी रचनाएं और विचार आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, भाषा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने की प्रेरणा देते रहेंगे।

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