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रांची: राजधानी रांची के बहुचर्चित मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित ‘निर्मल हृदय’ आश्रम से नवजात बच्चे को कथित रूप से बेचने के मामले में रांची सिविल कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने इस मामले की दोनों मुख्य आरोपित महिलाओं, सिस्टर कांसिलिया बाखला और अनिमा इंदवार को साक्ष्य (सबूत) और गवाहों के अभाव में पूरी तरह से बरी कर दिया है।
रांची सिविल कोर्ट के अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत ने इस हाई-प्रोफाइल मामले की अंतिम सुनवाई की। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी दस्तावेजों, उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहराई से परीक्षण किया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को कानूनी रूप से प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा। इसके मद्देनजर, अदालत ने कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत आरोपियों को संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) देते हुए केस से दोषमुक्त कर दिया।
पीड़ित पक्ष के कोर्ट न पहुंचने से कमजोर हुआ केस
इस पूरे मामले की न्यायिक प्रक्रिया और सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब मामले से जुड़े मुख्य पीड़ित पक्ष का बयान ही अदालत में दर्ज नहीं हो सका। कानूनी जानकारों के मुताबिक, न्यायालय की ओर से पीड़ित पक्ष को अपना पक्ष रखने और गवाही देने के लिए कई बार आधिकारिक नोटिस और समन जारी किए गए थे। इसके बावजूद, पीड़ित परिवार का कोई भी सदस्य गवाही देने के लिए कोर्ट के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। मुख्य शिकायतकर्ताओं और पीड़ितों की इस अनुपस्थिति के कारण सरकारी पक्ष (अभियोजन) का पूरा केस बेहद कमजोर पड़ गया और अदालत को आरोपियों के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिल सका।
क्या था साल 2018 का यह पूरा विवाद?
गौरतलब है कि निर्मल हृदय आश्रम से जुड़ा यह संवेदनशील मामला साल 2018 में उजागर हुआ था, जिसने न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश की राजनीति और सामाजिक गलियारों में भारी तूफान खड़ा कर दिया था। मिशनरीज ऑफ चैरिटी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के केंद्र से बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त और सौदेबाजी की खबरें आने के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से लेकर केंद्रीय जांच एजेंसियों तक ने इस पर संज्ञान लिया था।
यह मामला तब प्रकाश में आया था जब चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) रांची की ओर से पुलिस में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। सीडब्ल्यूसी का आरोप था कि निर्मल हृदय आश्रम में अवैध रूप से बच्चों का सौदा किया जा रहा है। जांच के बाद पुलिस ने दावा किया था कि अविवाहित माताओं से पैदा हुए बच्चों को पैसों के बदले दूसरे परिवारों को सौंपा जा रहा था। इसी जांच के आधार पर पुलिस ने आश्रम की सिस्टर कांसिलिया बाखला और वहां काम करने वाली कर्मचारी अनिमा इंदवार को मुख्य आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार किया था, जिसके बाद दोनों को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में जेल में रहना पड़ा था।
सात साल बाद लगा विवादों पर विराम
इस मामले को लेकर समाज और मीडिया में कई तरह की चर्चाएं थीं। पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद लगभग सात वर्षों तक इस मामले की अदालती कार्यवाही चलती रही। अब, रांची सिविल कोर्ट के इस अंतिम फैसले के साथ ही साल 2018 से चल रहे इस देशव्यापी चर्चित अध्याय का कानूनी पटाक्षेप हो गया है। कोर्ट के बरी करने के आदेश के बाद दोनों महिलाओं को बड़ी राहत मिली है।

