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New Delhi: पश्चिम एशिया (West Asia) में अमेरिका और इजरायल की साझा कार्रवाई ने वैश्विक सुरक्षा ढांचे को हिलाकर रख दिया है। ईरान की जवाबी हमले की चेतावनी और डोनाल्ड ट्रंप के ‘विनाशकारी परिणाम’ भुगतने के अल्टीमेटम ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की आशंकाओं से भर दिया है। हालांकि, सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि महाशक्तियों के सीधे युद्ध में कूदने की संभावना फिलहाल कम है।
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गठबंधन और ध्रुवीकरण: कौन किसके साथ?: मौजूदा स्थिति में दुनिया स्पष्ट रूप से दो गुटों में बंटी नजर आ रही है:
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अमेरिका-इजरायल गठबंधन: अमेरिका और इजरायल के साथ यूनाइटेड किंगडम रणनीतिक रूप से खड़ा है। नाटो (NATO) देश कूटनीतिक और चेतावनी तंत्र के जरिए मदद कर रहे हैं। इनका मुख्य लक्ष्य ईरान की परमाणु और मिसाइल शक्ति को खत्म करना है।
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ईरान और ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’: ईरान अपने क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों—हिज्बुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) और शिया मिलिशिया (इराक/सीरिया)—पर निर्भर है। हालांकि, हालिया हमलों ने इन संगठनों के नेटवर्क को काफी कमजोर कर दिया है।
रूस और चीन की भूमिका: ‘वेट एंड वॉच’ की नीति: रूस और चीन ने इजरायली हमलों की निंदा तो की है, लेकिन वे सीधे तौर पर ईरान के पक्ष में युद्ध में उतरते नहीं दिख रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये दोनों महाशक्तियां इस संघर्ष में अमेरिका को उलझा हुआ देखकर अपना रणनीतिक लाभ देख सकती हैं, लेकिन अपनी सेना भेजना उनके आर्थिक और कूटनीतिक हितों के खिलाफ होगा।
अरब देशों और भारत का रुख: सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे देश कठिन स्थिति में हैं। उनकी ईरान से पुरानी दुश्मनी है, लेकिन वे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर तबाही भी नहीं चाहते। पाकिस्तान ने ईरान की आत्मरक्षा का समर्थन किया है, लेकिन अमेरिका से सीधे पंगा लेने की उसकी क्षमता नहीं है। वहीं, भारत ने हमेशा की तरह संतुलित रुख अपनाते हुए शांति और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की वकालत की है।
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क्या यह विश्वयुद्ध की शुरुआत है?: रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महाशक्तियां (रूस-चीन बनाम अमेरिका) सीधे तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ हथियार नहीं उठातीं, इसे विश्वयुद्ध कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि, यदि युद्ध का दायरा खाड़ी के बाहर फैला, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

