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गुरु, गैंग और ग्लैमर: जमशेदपुर से देहरादून तक विक्रम शर्मा की अधूरी सत्ता-कथा

Jamshedpur: शहर की आपराधिक फाइलों, कारोबारी सौदों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच एक नाम दो दशकों तक बार-बार उभरता रहा—विक्रम शर्मा। कभी मार्शल आर्ट सिखाने वाला यह युवक धीरे-धीरे उस काले संसार का हिस्सा बन गया, जहां फैसले खुले मंच पर नहीं, बल्कि बंद कमरों

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Jamshedpur: शहर की आपराधिक फाइलों, कारोबारी सौदों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच एक नाम दो दशकों तक बार-बार उभरता रहा—विक्रम शर्मा। कभी मार्शल आर्ट सिखाने वाला यह युवक धीरे-धीरे उस काले

संसार का हिस्सा बन गया, जहां फैसले खुले मंच पर नहीं, बल्कि बंद कमरों में होते हैं। उसका अंत देहरादून में जिम के बाहर गोलियों की बौछार के साथ हुआ, लेकिन उसकी कहानी जमशेदपुर की गलियों में बहुत पहले लिखी जा चुकी थी।

कहा जाता है कि अपराध की दुनिया में उसकी असली पहचान तब बनी जब उसका संपर्क झारखंड के चर्चित गैंगस्टर अखिलेश सिंह से हुआ। युवा अवस्था से कराटे ट्रेनिंग से शुरू हुआ यह रिश्ता आगे चलकर रणनीतिक साझेदारी में बदल गया। दोनों अपराध की दुनिया में आ गए।इस कड़ी में कई बड़े घटनाक्रमों में सामने अखिलेश सिंह दिखता था, लेकिन पटकथा विक्रम शर्मा लिखता था।

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साल 1998 में बिस्टुपुर के कीनन स्टेडियम के पास ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की दिनदहाड़े हत्या ने शहर को हिला दिया। करोड़ों की संपत्ति के मालिक अशोक शर्मा की मौत के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, नाम उछले, गिरोहों की चर्चा हुई। हालांकि अदालत में कई आरोप टिक नहीं पाए और कुछ आरोपी बरी हो गए, लेकिन शहर की स्मृति में यह मामला लंबे समय तक ताजा रहा।

इस हत्याकांड के बाद घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया जिसने कानाफूसी को और हवा दी। अशोक शर्मा की पत्नी पिंकी शर्मा संपत्ति की अकेली वारिस बनीं। कुछ समय बाद उनका विवाह विक्रम शर्मा के छोटे भाई से हुआ। आलोचकों ने इसे महज पारिवारिक रिश्ता नहीं, बल्कि संपत्ति और प्रभाव के समीकरण के रूप में देखा। समर्थकों ने इसे संयोग बताया, विरोधियों ने रणनीति।

2007 और 2008 के बीच शहर में हुई कई फायरिंग और हत्याओं में भी विक्रम शर्मा का नाम चर्चा में आता रहा—साकची, बर्मामाइंस और अन्य इलाकों में हुई वारदातों ने उसे फिर सुर्खियों में ला दिया। कई मामलों में अदालत से राहत मिलने के बावजूद उसकी छवि “बैकस्टेज प्लेयर” की बनी रही—ऐसा शख्स जो सामने कम, प्रभाव ज्यादा रखता है।

अपराध की दुनिया के साथ-साथ उसने कारोबारी चेहरा भी गढ़ा। परिवहन और अन्य व्यवसायों में दखल बढ़ाया, एक मीडिया हाउस की शुरुआत की और सार्वजनिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। नेताओं के साथ मुलाकातों की तस्वीरें, सोशल मीडिया पर सक्रियता, अंगरक्षकों का घेरा और आलीशान जीवन—यह सब उसकी नई पहचान का हिस्सा बन गया। वह यह संदेश देना चाहता था कि अब उसका लक्ष्य सिर्फ डर नहीं, बल्कि सत्ता है।

बताया जाता है कि वह चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में था। अपराध से अर्जित प्रभाव, व्यापार से जुटाए संसाधन और राजनीति में प्रवेश की महत्वाकांक्षा—इन तीनों ने मिलकर उसकी कहानी को और जटिल बना दिया।

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लेकिन देहरादून में जिम से बाहर निकलते वक्त चली गोलियों ने इस पूरे अध्याय को अचानक विराम दे दिया। जिस शख्स पर आरोप था कि वह पर्दे के पीछे से खेल रचता है, उसका अंत खुलेआम हुआ।

जमशेदपुर के लिए विक्रम शर्मा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस दौर की कहानी है जब अपराध, कारोबार और राजनीति की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं—और एक व्यक्ति उन तीनों के संगम पर खड़ा दिखाई देता है।

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